कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना के बीच सामने आए रुझानों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय जनता पार्टी की बढ़त केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य की राजधानी कोलकाता के शहरी क्षेत्रों में भी पार्टी ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है. लंबे समय तक वामपंथी दलों और बाद में तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव वाले इलाकों में भाजपा की बढ़त ने राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं.
सोमवार को मतगणना के दौरान सामने आए आंकड़ों के अनुसार भाजपा बेहाला पश्चिम, बेहाला पूर्व, जादवपुर और टॉलीगंज जैसे महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों में आगे चल रही थी. ये सभी इलाके कोलकाता नगर निगम के विस्तारित हिस्सों में आते हैं और करीब 40 वार्डों को कवर करते हैं. इन सीटों पर भाजपा की बढ़त को राजनीतिक विश्लेषक शहरी वोट बैंक में बदलाव के तौर पर देख रहे हैं.
राजधानी के 11 प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों में से छह सीटों—भवानीपुर, चौरंगी, एंटाली, कोलकाता पोर्ट और बेलियाघाटा—पर तृणमूल कांग्रेस आगे चल रही थी, जबकि भाजपा जोरासांको, मानिकतला, श्यामपुकुर, रासबिहारी और काशीपुर-बेलगछिया सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी. शाम तक के रुझानों में जादवपुर में भाजपा करीब 17 हजार वोटों से आगे थी, जबकि बेहाला पूर्व और पश्चिम में भी पार्टी ने उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की. टॉलीगंज में मुकाबला अपेक्षाकृत कड़ा रहा, लेकिन वहां भी भाजपा बढ़त बनाए रखने में सफल दिखी.
इन इलाकों का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है. 1980 और 1990 के दशक में जब इन क्षेत्रों को कोलकाता नगर निगम की सीमा में शामिल किया गया था, तब वाम मोर्चा सरकार ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की थी. इन क्षेत्रों के शामिल होने से सीपीएम को शहरी निकायों में अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद मिली थी और उसने लंबे समय तक नगर निगम पर नियंत्रण बनाए रखा.
इन इलाकों की जनसांख्यिकी भी राजनीतिक रुझानों को प्रभावित करती रही है. 1971 के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की बड़ी आबादी यहां बस गई थी, जो लंबे समय तक वाम दलों का मजबूत समर्थन आधार रही. यहां तक कि 2011 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी सीपीएम इन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करती रही थी.
ऐतिहासिक रूप से देखें तो बेहाला पश्चिम ने 11 में से 9 चुनावों में वाम दलों को समर्थन दिया था, जबकि जादवपुर सीट पर सीपीएम 13 बार जीत दर्ज कर चुकी थी. रासबिहारी जैसे क्षेत्र में, जो कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, 1977 के बाद शायद ही कोई गैर-कांग्रेस या गैर-तृणमूल उम्मीदवार जीत सका हो. जोरासांको सीट भी लंबे समय तक कांग्रेस और तृणमूल के कब्जे में रही है और 1977 के बाद पहली बार यहां किसी अन्य दल की मजबूत चुनौती देखने को मिल रही है.
विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की यह बढ़त केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं के बदलते रुझानों का संकेत भी है. राज्य में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले दलों के प्रति असंतोष, विकास और पहचान की राजनीति जैसे मुद्दों ने मतदाताओं को नए विकल्प की ओर आकर्षित किया है.
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, कोलकाता जैसे शहरी केंद्र में भाजपा की बढ़त यह दर्शाती है कि पार्टी अब केवल ग्रामीण या अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने शहरों में भी अपनी पैठ बना ली है. यह बदलाव भविष्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, खासकर तब जब शहरी मतदाता अक्सर चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं.
इन रुझानों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में पारंपरिक वोट बैंक अब तेजी से बदल रहे हैं. जहां एक ओर तृणमूल कांग्रेस अभी भी कई सीटों पर मजबूत स्थिति में है, वहीं भाजपा की बढ़ती उपस्थिति ने मुकाबले को त्रिकोणीय और अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है.
मतगणना के अंतिम नतीजे भले ही कुछ अलग तस्वीर पेश करें, लेकिन फिलहाल के रुझान यह संकेत दे रहे हैं कि कोलकाता की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है, जहां पुराने गढ़ ढह रहे हैं और नए समीकरण बन रहे हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-


