रेलवे को हाई कोर्ट की दो टूक, कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं कर सकता बेदखली

रेलवे को हाई कोर्ट की दो टूक, कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं कर सकता बेदखली

प्रेषित समय :21:10:14 PM / Wed, Jun 24th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

देहरादून. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने रेलवे भूमि पर कथित अतिक्रमण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को केवल एक सामान्य प्रशासनिक नोटिस के आधार पर उसकी संपत्ति या कब्जे वाली भूमि से नहीं हटाया जा सकता. अदालत ने कहा कि चाहे कब्जा अवैध ही क्यों न हो, किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना जबरन बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा.

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें नॉर्दर्न रेलवे, देहरादून के वरिष्ठ अनुभाग अभियंता (वर्क्स) द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी गई थी. याचिकाकर्ताओं ने मसूरी के झारीपानी क्षेत्र स्थित संपत्ति पर अपना स्वामित्व और कब्जा होने का दावा किया था. रेलवे की ओर से जारी नोटिस में कथित रूप से रेलवे भूमि पर अतिक्रमण करने वालों को भूमि खाली करने के निर्देश दिए गए थे.

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संबंधित नोटिस उनके घरों पर चस्पा किया गया था, जिससे उन्हें तत्काल बेदखली का भय उत्पन्न हो गया. उन्होंने अदालत को बताया कि बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर उन्हें हटाने की कोशिश की जा रही है.

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति से जबरन बेदखल करना तब तक संभव नहीं है, जब तक उसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन न किया जाए. अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थापित कब्जा, चाहे वह वैध हो या अवैध, उसे भी बलपूर्वक समाप्त नहीं किया जा सकता. यदि भूमि का वास्तविक स्वामी किसी कब्जाधारी को हटाना चाहता है तो उसे सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना होगा और विधिक प्रक्रिया का पालन करना होगा.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि कानून किसी भी परिस्थिति में किसी व्यक्ति को बल प्रयोग या प्रशासनिक आदेश के माध्यम से बेदखल करने की अनुमति नहीं देता. यह न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है. न्यायालय ने दोहराया कि स्थापित कब्जे वाले व्यक्ति को हटाने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय के आदेश के आधार पर ही प्रयोग किया जा सकता है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि विवादित नोटिस किसी विशिष्ट वैधानिक प्रावधान के अंतर्गत जारी नहीं किया गया था. ऐसे में केवल यह कह देना कि संबंधित व्यक्ति तीस दिनों के भीतर भूमि खाली कर दे, कानून की दृष्टि में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता. न्यायालय के अनुसार किसी भी बेदखली कार्रवाई के लिए उचित कानूनी आधार और प्रक्रिया आवश्यक है.

सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न न्यायिक निर्णयों में स्थापित उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार भूमि का वास्तविक मालिक भी कानून को अपने हाथ में लेकर कब्जाधारी को बलपूर्वक नहीं हटा सकता. इसके लिए न्यायालय से आदेश प्राप्त करना अनिवार्य है.

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2023 को जारी नोटिस को याचिकाकर्ताओं के संबंध में निरस्त कर दिया. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि रेलवे की भूमि पर वास्तव में अवैध कब्जा पाया जाता है तो रेलवे प्रशासन कानून के अनुरूप उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा.

हाई कोर्ट के इस फैसले को संपत्ति अधिकारों और विधिक प्रक्रिया की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से यह संदेश दिया है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करते समय कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन सर्वोपरि है और प्रशासनिक सुविधा के नाम पर संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-