कान्हा में बाघों की मौत पर हाई कोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकार से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

कान्हा में बाघों की मौत पर हाई कोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य सरकार से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

प्रेषित समय :20:18:10 PM / Wed, Jun 24th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर। कान्हा टाइगर रिजर्व में एक माह के भीतर आठ बाघों की मौत के मामले को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार को प्रभावी रोकथाम एवं उपचारात्मक उपाय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि देश की अमूल्य वन्यजीव धरोहर की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और इसके लिए निर्धारित सभी वैधानिक एवं प्रशासनिक प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है।

                                                                     प्रशासनिक न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित विभागों को विस्तृत स्टेट्स रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि रिजर्व क्षेत्र में संक्रमण के संभावित स्रोत माने जा रहे आवारा और घरेलू कुत्तों को क्वारंटीन करने सहित अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई नौ जुलाई को निर्धारित की गई है। यह जनहित याचिका मुंबई निवासी अधिवक्ता सुब्रत चक्रवर्ती द्वारा दायर की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि अप्रैल और मई 2026 के दौरान कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों की असामान्य मौतों ने वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। याचिका के अनुसार इस अवधि में बाघिन टी-122, जिसे सुनैना के नाम से जाना जाता था, बाघिन टी-141 अमाही, उसके चार अर्धवयस्क शावकों तथा युवा नर बाघ टी-220 महावीर की मौत हुई। इसके अतिरिक्त दो अन्य वयस्क नर बाघ भी मृत पाए गए। प्रारंभिक जानकारी में इन मौतों को कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) संक्रमण से जोड़कर देखा जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि लगातार हो रही इन मौतों से यह आशंका पैदा हुई है कि रिजर्व क्षेत्र में रोग निगरानी और जैव-सुरक्षा व्यवस्था अपेक्षित स्तर पर प्रभावी नहीं है। याचिका में तर्क दिया गया है कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, प्रोजेक्ट टाइगर तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देश बाघों की स्वास्थ्य निगरानी, रोग नियंत्रण, पशु चिकित्सा सुविधाओं और आवास प्रबंधन के स्पष्ट मानक निर्धारित करते हैं। इसके बावजूद संक्रमण की रोकथाम और निगरानी की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो पाई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही या निर्धारित मानकों के पालन में कमी पाई जाती है तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित विभागों को निर्देश दिया है कि वे यह स्पष्ट करें कि संक्रमण की रोकथाम, वन्यजीवों की चिकित्सकीय निगरानी, संभावित संक्रमित पशुओं की पहचान तथा रिजर्व क्षेत्र में जैव-सुरक्षा को मजबूत करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह और प्रतीक रूसिया ने पक्ष रखा। अदालत ने कहा कि बाघ केवल वन्यजीव नहीं बल्कि देश की प्राकृतिक धरोहर और जैव विविधता के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा में किसी भी प्रकार की चूक स्वीकार्य नहीं होगी। अब सभी की निगाहें केंद्र और राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि कान्हा में बाघों की मौतों को रोकने और भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-