एमपी के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को हाई कोर्ट से बड़ी राहत , संपत्ति छिपाने के आरोप वाली याचिका खारिज

एमपी के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को हाई कोर्ट से बड़ी राहत , संपत्ति छिपाने के आरोप वाली याचिका खारिज

प्रेषित समय :05:54:06 AM / Thu, Aug 6th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सुरखी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक एवं प्रदेश सरकार के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के विरुद्ध दायर याचिका को निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद प्रत्याशी द्वारा शपथपत्र में गलत जानकारी देने अथवा संपत्ति छिपाने के आरोपों की जांच या समीक्षा करने का अधिकार निर्वाचन आयोग अथवा जिला निर्वाचन तंत्र के पास नहीं रहता। अदालत ने कहा कि चुनाव संपन्न होने के बाद इस प्रकार के विवादों को केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा के भीतर ही चुनौती दी जा सकती है। इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।

यह फैसला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया एवं न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने सुनाया। यह याचिका सागर जिले की सुरखी विधानसभा क्षेत्र के निवासी तथा पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजकुमार सिंह द्वारा दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने नामांकन पत्र के साथ प्रस्तुत किए गए फार्म-26 (शपथपत्र) में अपनी, अपनी पत्नी तथा ज्ञानवीर सेवा समिति के स्वामित्व वाली लगभग 100 करोड़ रुपये मूल्य की कुछ अचल संपत्तियों का विवरण नहीं दिया था।

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि चुनावी शपथपत्र में संपत्तियों की जानकारी छिपाकर मतदाताओं को भ्रमित किया गया और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता प्रभावित हुई। इसी आधार पर निर्वाचन आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर कार्रवाई की मांग की गई थी। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने शिकायत पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा था कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद इस प्रकार की शिकायतों की सुनवाई का उसके पास क्षेत्राधिकार नहीं है।

निर्वाचन आयोग के इस निर्णय को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि मंत्री द्वारा चुनावी शपथपत्र में आवश्यक जानकारी छिपाई गई, इसलिए मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे ने अदालत को बताया कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के परिणाम 17 नवंबर 2023 को घोषित हो चुके थे, जबकि संबंधित शिकायत 21 मार्च 2025 को निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई। अर्थात चुनाव परिणाम घोषित होने के लगभग 17 महीने बाद शिकायत की गई, जो कानून में निर्धारित समय-सीमा से काफी अधिक विलंबित थी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से देरी का कारण जेल में निरुद्ध होना बताया गया। हालांकि, मंत्री की ओर से यह तर्क दिया गया कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा का पालन अनिवार्य है तथा केवल व्यक्तिगत कारणों के आधार पर वैधानिक व्यवस्था को दरकिनार नहीं किया जा सकता। निर्वाचन आयोग ने भी इसी आधार पर शिकायत को क्षेत्राधिकार के अभाव में निरस्त कर दिया था।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय एन. पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर का विस्तृत उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत पहले से स्थापित है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने और परिणाम घोषित होने के बाद चुनाव से संबंधित विवादों का निपटारा केवल चुनाव याचिका के माध्यम से ही किया जा सकता है। किसी भी प्रत्याशी द्वारा शपथपत्र में गलत जानकारी देने, संपत्ति छिपाने या चुनावी अनियमितता के आरोपों को सामान्य रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81(1) के अनुसार चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर सक्षम न्यायालय में चुनाव याचिका प्रस्तुत करना ही उपलब्ध वैधानिक उपाय है। यदि निर्धारित अवधि में चुनाव याचिका दायर नहीं की जाती, तो बाद में निर्वाचन आयोग या जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष इस प्रकार की शिकायत पर कार्रवाई का कोई अधिकार शेष नहीं रहता। इसलिए वर्तमान मामले में निर्वाचन आयोग द्वारा शिकायत निरस्त किया जाना पूरी तरह विधिसम्मत पाया गया।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि यदि किसी प्रत्याशी पर चुनावी शपथपत्र में जानबूझकर गलत जानकारी देने या तथ्य छिपाने का आरोप हो, तो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-ए के तहत उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई के लिए सक्षम आपराधिक न्यायालय में निजी परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है। हालांकि, कानून इसके लिए भी एक वर्ष की समय-सीमा निर्धारित करता है। न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में वह समय-सीमा भी काफी पहले समाप्त हो चुकी है, इसलिए इस आधार पर भी किसी प्रकार की कार्रवाई संभव नहीं है।

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि जब कानून किसी विवाद के समाधान के लिए स्पष्ट वैधानिक प्रक्रिया और समय-सीमा निर्धारित करता है, तब न्यायालय उस व्यवस्था से अलग जाकर राहत प्रदान नहीं कर सकता। इसलिए निर्वाचन आयोग के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई और याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार उपलब्ध नहीं है।

अदालत ने अंततः निर्वाचन आयोग के निर्णय को सही ठहराते हुए याचिका को निरस्त कर दिया। इस फैसले के साथ मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को बड़ी कानूनी राहत मिली है। वहीं, यह निर्णय चुनावी मामलों में समय-सीमा और वैधानिक प्रक्रिया के पालन को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद प्रत्याशियों के शपथपत्र, संपत्ति विवरण या अन्य चुनावी अनियमितताओं से जुड़े विवादों को केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में निर्धारित विधिक प्रक्रिया के अनुसार और निर्धारित समय के भीतर ही चुनौती दी जा सकती है। समय-सीमा समाप्त होने के बाद निर्वाचन आयोग अथवा जिला निर्वाचन तंत्र के समक्ष ऐसी शिकायतों पर विचार करने का कोई अधिकार नहीं रहता और रिट याचिका भी ऐसे मामलों में स्वीकार्य नहीं होगी।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-