गाइड बदले जाने की मांग लेकर हाई कोर्ट पहुंचे दो डॉक्टरों को झटका, 20 हजार की लागत के साथ याचिका खारिज

गाइड बदले जाने की मांग लेकर हाई कोर्ट पहुंचे दो डॉक्टरों को झटका, 20 हजार की लागत के साथ याचिका खारिज

प्रेषित समय :19:10:27 PM / Mon, Oct 5th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

  विधि संवाददाता,  जबलपुर। थीसिस गाइड के स्थानांतरण को आधार बनाकर नया गाइड नियुक्त करने और थीसिस जमा करने की समय सीमा बढ़ाने की मांग को लेकर हाई कोर्ट पहुंचे खंडवा मेडिकल कॉलेज के दो पीजी मेडिकल छात्रों को राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने दोनों की याचिकाओं को गलतफहमी पर आधारित मानते हुए निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने दोनों याचिकाकर्ताओं पर कुल 20 हजार रुपये की लागत भी लगाई है। दोनों डॉक्टरों को 10-10 हजार रुपये चार सप्ताह के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।
गाइड के मंदसौर स्थानांतरण को बनाया आधार-
मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया था कि उनके थीसिस गाइड डॉ. सौरभ जैन का खंडवा से मंदसौर स्थानांतरण हो गया है। इसके कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है। इसी आधार पर दोनों छात्रों ने नया थीसिस गाइड नियुक्त करने के साथ ही थीसिस जमा करने की अंतिम तारीख बढ़ाने की मांग हाई कोर्ट के समक्ष रखी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि गाइड के दूसरे शहर में स्थानांतरित हो जाने से उन्हें शोध कार्य के लिए व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसी स्थिति को आधार बनाकर उन्होंने न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी।
रिकॉर्ड में सामने आई अलग स्थिति-
सुनवाई के दौरान न्यायालय के सामने रिकॉर्ड रखा गया तो स्थिति याचिकाकर्ताओं के दावे से अलग पाई गई। रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि डॉ. सौरभ जैन के स्थानांतरण के बाद भी उन्हें दोनों छात्रों का थीसिस मार्गदर्शन जारी रखने की अनुमति दी गई थी। हाई कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि डॉ. सौरभ जैन ने दोनों छात्रों को मार्गदर्शन देने से इनकार किया था। यानी गाइड के स्थानांतरण के बावजूद छात्रों का थीसिस मार्गदर्शन बंद नहीं हुआ था।
संबंधित विषय में दूसरा प्रोफेसर उपलब्ध नहीं था-
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि खंडवा मेडिकल कॉलेज में संबंधित विषय में कोई अन्य प्रोफेसर उपलब्ध नहीं था। ऐसी स्थिति में डॉ. सौरभ जैन को ही दोनों छात्रों का मार्गदर्शन जारी रखने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने इसी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए माना कि केवल गाइड के खंडवा से मंदसौर स्थानांतरण को आधार बनाकर नया गाइड नियुक्त करने की मांग उचित आधार पर नहीं थी। छात्रों के सामने मंदसौर जाकर अपने गाइड से मार्गदर्शन लेने की व्यावहारिक कठिनाई जरूर थी, लेकिन इसे गाइड की अनुपलब्धता के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं माना गया।
कोर्ट ने याचिका को गलतफहमी पर आधारित माना-
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों का परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि छात्रों को अपने मूल गाइड से मार्गदर्शन जारी रखने की अनुमति पहले ही मिल चुकी थी। इसके बावजूद गाइड की अनुपलब्धता का आधार बनाकर याचिका दायर की गई। युगलपीठ ने इसी आधार पर याचिका को गलतफहमी पर आधारित माना और उसे निरस्त कर दिया। कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट हुआ कि शोध कार्य में सामने आई व्यावहारिक परेशानी और गाइड के वास्तव में अनुपलब्ध होने के बीच अंतर है। केवल स्थानांतरण के कारण गाइड को अनुपलब्ध मानकर न्यायालय से नया गाइड नियुक्त करने की मांग नहीं की जा सकती।
दोनों डॉक्टरों पर 20 हजार रुपये की लागत-
हाई कोर्ट ने याचिका निरस्त करने के साथ ही दोनों याचिकाकर्ताओं पर कुल 20 हजार रुपये की लागत लगाई है। दोनों डॉक्टरों को 10-10 हजार रुपये की राशि चार सप्ताह के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करनी होगी। कोर्ट ने याचिका के आधार और रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए यह आदेश दिया। इस तरह दोनों छात्रों को न तो नया गाइड मिला और न ही उनकी ओर से मांगी गई राहत स्वीकार की गई।
कुलपति और रजिस्ट्रार की उपस्थिति तक की नौबत-
मामले की सुनवाई के दौरान ऐसी स्थिति भी बनी कि मेडिकल विश्वविद्यालय के कुलपति और रजिस्ट्रार की न्यायालय के समक्ष उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी करने की नौबत आ गई थी। न्यायालय ने मामले की कार्यवाही के दौरान संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कड़ा रुख अपनाया। हालांकि अंतिम रूप से न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग पर उपलब्ध रिकॉर्ड और गाइड के संबंध में पहले से दी गई अनुमति को महत्वपूर्ण माना।
थीसिस मार्गदर्शन जारी रखने की व्यवस्था कायम-
कोर्ट के आदेश के बाद दोनों छात्रों के लिए डॉ. सौरभ जैन से थीसिस मार्गदर्शन जारी रखने की व्यवस्था बनी रहेगी। गाइड के स्थानांतरण के बावजूद उन्हें मार्गदर्शन जारी रखने की अनुमति दी जा चुकी थी और रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि गाइड ने मार्गदर्शन करने से इनकार किया हो। इस मामले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी प्रशासनिक स्थानांतरण से उत्पन्न व्यावहारिक कठिनाई को सीधे गाइड की अनुपलब्धता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। न्यायालय के सामने राहत मांगने के लिए ठोस और प्रमाणित आधार होना जरूरी है।
चार सप्ताह में जमा करनी होगी जुर्माने की राशि-
याचिका खारिज किए जाने के साथ दोनों डॉक्टरों को चार सप्ताह की समय सीमा दी गई है। प्रत्येक याचिकाकर्ता को 10 हजार रुपये मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करने होंगे। इस प्रकार दोनों पर कुल 20 हजार रुपये की लागत निर्धारित की गई है। हाई कोर्ट के इस आदेश से यह भी साफ हुआ कि शोधार्थियों के लिए गाइड की उपलब्धता से संबंधित दावे केवल व्यावहारिक कठिनाई के आधार पर स्वीकार नहीं किए जाएंगे, खासकर तब जब रिकॉर्ड में संबंधित गाइड को मार्गदर्शन जारी रखने की अनुमति पहले से मौजूद हो।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-