नई दिल्ली. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रिश्वत मांगने के आरोपी लोक सेवक को जांच से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी लेने संबंधी कानूनी संरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. अदालत ने कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों के कारण अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है, न कि आपराधिक कृत्यों को संरक्षण देना.
क्या है कानूनी प्रावधान?
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की व्याख्या करते हुए यह टिप्पणी की. वर्ष 2018 में जोड़ी गई इस धारा के तहत, आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में की गई सिफारिश या लिए गए निर्णय से संबंधित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक है.
कांस्टेबल पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप
मामला राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल से जुड़ा है, जिसने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) और दाखिल आरोपपत्र को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. कांस्टेबल पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप था.
अपील खारिज करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 17ए के तहत मिलने वाले संरक्षण को आपराधिक मामलों का सामना कर रहे सभी लोक सेवकों पर बिना किसी भेदभाव के लागू नहीं किया जा सकता. इस प्रावधान का लाभ तभी मिल सकता है, जब मामला इसके निर्धारित दायरे में आता हो.
रिश्वत मांगना आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं
राजस्थान की अतिरिक्त महाधिवक्ता संस्कृति पाठक की दलीलों से सहमति जताते हुए अदालत ने कहा कि रिश्वत की मांग करना अपने आप में आपराधिक कृत्य है. इसका किसी लोक सेवक के आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन, सिफारिश या निर्णय से संबंध नहीं माना जा सकता.
मंजूरी के अभाव में कार्रवाई दूषित नहीं
फैसला लिखते हुए जस्टिस एनवी अंजारिया ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अपीलकर्ता का कथित कृत्य धारा 17ए के तहत मिलने वाले संरक्षण के दायरे में नहीं आता. इसलिए केवल सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी नहीं होने के आधार पर पूरी आपराधिक कार्यवाही को दूषित नहीं ठहराया जा सकता.
इस फैसले से अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कानूनी संरक्षण का दायरा तय करते समय आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े निर्णयों और रिश्वत मांगने जैसे कथित आपराधिक कृत्यों के बीच अंतर करना जरूरी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-





