डिजिटल क्रांति और एआई के दौर में स्याही से पिक्सल तक बदलती हिंदी पत्रकारिता

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास गवाह है कि इसने हमेशा समाज की धड़कनों को शब्दों के जरिए कागज़ पर उतारा है, लेकिन पिछले एक दशक में इस सफर ने जो मोड़ लिया है, वह किसी महाकाव्य के अध्याय बदलने जैसा है. कल तक सुबह के अखबार की दस्तक और चाय की चुस्की के साथ शुरू होने वाला सूचनाओं का सिलसिला अब अंगूठे के एक स्वाइप पर सिमट गया है. प्रिंट मीडिया, जो कभी सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा करने का इकलौता जरिया था, आज डिजिटल और वीडियो प्लेटफॉर्म्स की सुनामी के बीच अपनी जमीन बचाने और खुद को नए सांचे में ढालने की जद्दोजहद कर रहा है. यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं है, बल्कि यह पत्रकारिता के मिजाज, उसकी भाषा और सबसे महत्वपूर्ण, उसके सरोकारों के बदलने की कहानी है.

जब हम प्रिंट से डिजिटल और फिर यूट्यूब के इस त्रिकोणीय सफर को देखते हैं, तो आंकड़ों की जुबानी इस बदलाव की भयावहता और भव्यता दोनों समझ आती है. एक दौर था जब हिंदी के प्रमुख अखबारों की प्रसार संख्या करोड़ों में हुआ करती थी, लेकिन हालिया वर्षों में 'डिजिटल फर्स्ट' के मंत्र ने इस समीकरण को उलट दिया है. आज भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 80 करोड़ के पार पहुंच चुकी है, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा अपनी खबरों के लिए केवल सोशल मीडिया और यूट्यूब पर निर्भर है. प्रिंट के दौर में 'डेडलाइन' का एक अनुशासन था. संपादक के पास समय होता था कि वह खबर की तह तक जाए, उसे परखे और फिर पाठकों के सामने परोसे. लेकिन आज के 'ब्रेकिंग न्यूज' और 'वायरल कल्चर' ने उस ठहराव को छीन लिया है. डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने खबर की रफ्तार को तो पंख लगा दिए, लेकिन इस रफ्तार में कहीं न कहीं वह गहराई पीछे छूट गई जो कभी हिंदी लेखनी की पहचान हुआ करती थी.

इस संक्रमण काल में सबसे अधिक प्रभावित हुई है पत्रकारिता की भाषा और उसका अर्थशास्त्र. जो हिंदी कभी साहित्यिक मर्यादाओं और व्याकरण की शुचिता से बंधी थी, वह अब 'क्लिक' पाने की मजबूरी में हिंग्लिश और बोलचाल की सरलता की ओर झुक गई है. डिजिटल स्क्रीन पर पाठक की एकाग्रता का समय (अटेंशन स्पैन) मात्र 8 से 12 सेकंड रह गया है, इसलिए अब लंबे विश्लेषणों की जगह 'इनफोग्राफिक्स' और 'शॉर्ट्स' ने ले ली है. यूट्यूब जैसे मंचों ने तो पत्रकारिता के व्याकरण को ही उलट दिया है. यहाँ अब 'एंकर' और 'संवाददाता' के बीच की लकीर मिट गई है. हर वह व्यक्ति जिसके पास कैमरा और इंटरनेट है, वह खुद को एक मीडिया संस्थान के रूप में पेश कर रहा है. इससे एक ओर तो मुख्यधारा के मीडिया से छूटे हुए मुद्दे सामने आए हैं, लेकिन दूसरी ओर सतही ज्ञान और सनसनी का एक ऐसा बाजार सज गया है जिसने गंभीर विमर्श को हाशिए पर धकेल दिया है.

अब इस परिदृश्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  का प्रवेश एक नए और चुनौतीपूर्ण युग की आहट है. न्यूज़हॉल के भीतर अब एआई केवल डेटा विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खबरों को लिखने, अनुवाद करने और यहाँ तक कि न्यूज़ एंकरिंग तक में दखल दे रहा है. एआई ने पत्रकारिता की कार्यक्षमता को तो कई गुना बढ़ा दिया है, लेकिन इसके साथ ही इसने 'मानवीय संवेदना' और 'नैतिकता' पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. जब एक मशीन खबर लिखती है, तो वह तथ्यों को जोड़ तो सकती है, लेकिन वह उस मानवीय पीड़ा को शब्द नहीं दे सकती जो एक रिपोर्टर मौके पर महसूस करता है. एआई का सबसे खतरनाक प्रभाव 'डीपफेक' के रूप में सामने आ रहा है, जहाँ 70 प्रतिशत से अधिक उपयोगकर्ता असली और नकली वीडियो में फर्क नहीं कर पाते. एल्गोरिदम अब यह तय कर रहे हैं कि आप क्या पढ़ेंगे, जिससे समाज में 'फिल्टर बबल' बन रहे हैं यानी व्यक्ति केवल अपनी पसंद की कट्टर सोच वाली खबरें ही देख पाता है.

आर्थिक मोर्चे पर भी यह बदलाव किसी भूकंप से कम नहीं है. प्रिंट मीडिया का जो विज्ञापन राजस्व कभी 40 प्रतिशत की दर से बढ़ता था, वह अब सिमटकर डिजिटल दिग्गजों की जेब में जा रहा है. डिजिटल मीडिया में राजस्व का मॉडल अभी भी प्रयोग के दौर से गुजर रहा है. 'पेवॉल' और 'सब्सक्रिप्शन' जैसी कोशिशें हिंदी पट्टी में अभी भी संघर्ष कर रही हैं. नतीजा यह है कि राजस्व के लिए मीडिया घरानों को अब 'स्पॉन्सर्ड कंटेंट' का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे निष्पक्षता की दीवारें कमजोर हुई हैं. यूट्यूब ने एक नए अर्थशास्त्र को जन्म दिया है, जहां 'व्यूज' और 'वॉच टाइम' ही सबसे बड़ी मुद्रा है. जब खबर का महत्व उसकी सामाजिक उपयोगिता से नहीं बल्कि उसके 'वायरल' होने की क्षमता से तय होने लगे, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए खतरे की घंटी है.

बावजूद इसके, इस बदलाव ने पत्रकारिता को दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के वातानुकूलित कमरों से निकालकर छोटे शहरों और कस्बों की गलियों तक पहुँचा दिया है. आज ग्रांउड रिपोर्टिंग का अर्थ केवल बड़े चैनलों की ओबी वैन नहीं, बल्कि एक मोबाइल हाथ में थामे वह निर्भीक पत्रकार भी है जो सत्ता से सीधे सवाल पूछ रहा है. भविष्य की हिंदी पत्रकारिता अब एक 'हाइब्रिड' मॉडल की ओर बढ़ रही है. अखबार अब केवल सूचना के वाहक नहीं, बल्कि गहन विश्लेषण के दस्तावेज बन रहे हैं. एआई के दौर में असली चुनौती केवल तकनीक को अपनाने की नहीं है, बल्कि उस 'साख' को बचाने की है जो मशीनी शोर में कहीं दब गई है. हिंदी पत्रकारिता का यह सफर स्याही से पिक्सल और अब एआई तक तो पहुंच गया है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी बनी रहेगी जब यह 'सत्य' की उस मशाल को जलाए रखेगा जिसे लेकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पुरोधाओं ने इसे शुरू किया था. तकनीक और मशीनें केवल उपकरण हो सकती हैं, पत्रकारिता की आत्मा तो हमेशा मानवीय विवेक और जनसरोकार ही रहेगी.

 

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