आज की लघुकथा: ‘नदी का प्रश्न’

आज की लघुकथा: ‘नदी का प्रश्न’

प्रेषित समय :17:49:56 PM / Sun, Feb 15th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

पहाड़ों की गोद से निकलकर एक नदी सदियों से धरती के सीने पर अपना रास्ता बनाती चली आ रही थी. उसकी धाराओं में बचपन की चंचलता, युवावस्था की ऊर्जा और वृद्धावस्था की गंभीरता एक साथ बहती थी. वह गाँवों को जीवन देती, खेतों को हरियाली देती और शहरों की प्यास बुझाती हुई आगे बढ़ती रहती थी.

आज नदी का प्रवाह कुछ धीमा था. उसकी लहरों में एक अजीब-सी बेचैनी थी. किनारे खड़े पुराने पीपल के पेड़ ने यह बदलाव महसूस किया और धीरे से पूछा, “बहन, आज तेरी धारा इतनी उदास क्यों है?”

नदी ने हल्की-सी लहर उठाई, मानो अपनी पीड़ा को शब्दों में ढालने की कोशिश कर रही हो. “भैया, मैं थक गई हूँ. सदियों से मैं सबको जीवन देती आई हूँ, लेकिन अब लगता है कि मेरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है.”

पीपल ने आश्चर्य से पूछा, “तू तो जीवन का स्रोत है. तुझसे ही संसार चलता है. फिर ऐसा क्या हुआ?”

नदी की धारा एक पल को काँप उठी. “इंसान ने मुझे बाँट दिया है. कहीं बाँध बनाकर मेरे प्रवाह को रोक दिया, तो कहीं मेरे पानी को व्यापार बना दिया. मेरे किनारों पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं. मेरी लहरों में अब मछलियाँ कम और प्लास्टिक ज्यादा तैरता है.”

पीपल की पत्तियाँ सिहर उठीं. “क्या उन्हें यह नहीं समझ आता कि अगर नदी रुक गई, तो जीवन भी रुक जाएगा?”

नदी ने धीमे स्वर में कहा, “वो समझते हैं, लेकिन विकास के नाम पर मेरी साँसें घोंट देते हैं. पहले बच्चे मेरे किनारों पर खेलते थे, महिलाएँ मेरे जल से पूजा करती थीं, किसान मेरी धाराओं से अपने खेत सींचते थे. अब लोग मुझे केवल संसाधन मानते हैं, जीवन नहीं.”

तभी पास ही से गुजरते एक छोटे बच्चे की आवाज़ सुनाई दी. वह अपनी दादी का हाथ पकड़े नदी किनारे आया था. बच्चे ने नदी की ओर देखते हुए पूछा, “दादी, क्या यह वही नदी है जिसके बारे में आपने कहा था कि यह कभी बहुत साफ हुआ करती थी?”

दादी की आँखों में यादों की चमक उभर आई. “हाँ बेटा, यही वह नदी है. कभी इसका पानी इतना साफ था कि इसमें आसमान दिखाई देता था. हम इसमें स्नान करते थे, इसका पानी पीते थे.”

बच्चे ने नदी की ओर झुककर देखा. उसे पानी में कचरा तैरता दिखाई दिया. उसने मासूमियत से पूछा, “दादी, फिर अब यह गंदी क्यों हो गई?”

दादी कुछ पल चुप रहीं. उनके पास इस सवाल का आसान जवाब नहीं था.

नदी ने यह सब सुना. उसकी धाराएँ एक पल को भारी हो गईं. उसने पीपल से कहा, “देखा भैया, नई पीढ़ी सवाल पूछ रही है. शायद यही सवाल इंसान को सोचने पर मजबूर करेगा.”

पीपल ने सहमति में अपनी शाखाएँ हिलाईं. “जब सवाल जन्म लेते हैं, तब बदलाव का रास्ता भी बनता है.”

तभी दूर से मशीनों की आवाज़ सुनाई देने लगी. कुछ लोग नदी के किनारे नए निर्माण की तैयारी कर रहे थे. नदी की धाराएँ घबराकर तेज हो उठीं. “भैया, क्या मेरा रास्ता फिर बदला जाएगा? क्या मेरी लहरें फिर कैद कर दी जाएँगी?”

पीपल ने गंभीर स्वर में कहा, “शायद इंसान यह भूल गया है कि नदी का रास्ता रोकना, समय को रोकने जैसा है. समय और नदी दोनों को बाँधा नहीं जा सकता.”

नदी कुछ पल शांत रही. फिर उसने आसमान की ओर देखा, जहाँ बादल धीरे-धीरे घिर रहे थे. “मैं हर साल नई बारिश के साथ जन्म लेती हूँ. मैं बार-बार लौटती हूँ. लेकिन अगर इंसान ने मुझे पूरी तरह रोक दिया, तो शायद एक दिन मैं लौटना ही बंद कर दूँ.”

इतना कहकर नदी की लहरें किनारे से टकराईं. उस टकराहट में दर्द भी था और चेतावनी भी.

पीपल ने धीरे से कहा, “बहन, तू बहती रह. जब तक तू बहती रहेगी, उम्मीद भी बहती रहेगी. लेकिन शायद अब समय आ गया है कि इंसान तेरे प्रश्न का उत्तर खोजे.”

नदी की धारा थोड़ी तेज हो गई. उसकी लहरों में फिर हल्की चमक दिखाई दी. मानो वह अब भी उम्मीद का सहारा लिए आगे बढ़ना चाहती हो.

लेकिन जाते-जाते उसने एक प्रश्न हवा में छोड़ दिया –
“क्या इंसान मुझे बचाएगा… या मेरे बिना जीना सीख जाएगा?”

कल का संकेत:
कल की कहानी ‘पेड़ की अंतिम चिट्ठी’ में प्रकृति का वह दर्द सामने आएगा, जहाँ एक कटने जा रहा पेड़ इंसान के नाम अपनी आखिरी बात लिखेगा. क्या इंसान उस चिट्ठी को पढ़ पाएगा? कल पढ़िए…

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-