जबलपुर। एमपी हाईकोर्ट ने कोर्ट पेशी के दौरान कैदियों के भोजन खर्च को लेकर अपनाई जा रही व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इसे गंभीर प्रक्रियागत खामी मानते हुए जेल महानिदेशक (डीजी जेल) को हलफनामे के साथ जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई पर जेल विभाग को इस संबंध में विस्तृत जवाब प्रस्तुत करना होगा।
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ दहेज हत्या के एक दोषी की अपील पर सुनवाई कर रही थी। रीवा जेल में बंद आरोपी को सुनवाई के लिए जबलपुर हाईकोर्ट लाया गया था। आरोपी ने कानूनी सहायता के लिए अधिवक्ता उपलब्ध कराने की मांग की, जिस पर कोर्ट ने अधिवक्ता रवि शंकर पटेल को न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया। सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने आरोपी को लेकर आए सुरक्षाकर्मियों से पूछा कि पेशी के दौरान कैदी के भोजन का खर्च किस प्रकार वहन किया जाता है। इस पर पुलिसकर्मियों ने बताया कि कैदियों के भोजन के लिए अलग से कोई बजट या डाइट अलाउंस नहीं दिया जाता। उन्हें मिलने वाले दैनिक भत्ते से ही कैदी के भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती है।
कोर्ट ने कहा, जेल में डाइट शून्य, तो राशि पुलिसकर्मियों को मिले-
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई कैदी पेशी के लिए जेल से बाहर रहता है, तब उस अवधि में जेल रिकॉर्ड में उसकी डाइट की एंट्री शून्य रहती है। ऐसे में उस अवधि की डाइट राशि उन पुलिसकर्मियों को मिलनी चाहिए, जो कैदी को कोर्ट लाने-ले जाने के दौरान उसके भोजन की व्यवस्था करते हैं।
डीजी जेल से नीति और हलफनामा मांगा-
हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए डीजी जेल को निर्देश दिए कि इस संबंध में स्पष्ट और पारदर्शी नीति तैयार कर हलफनामा पेश करें। कोर्ट ने आदेश की प्रति डीजी जेल को भेजते हुए कहा है कि पेशी पर आने वाले बंदियों के भोजन खर्च के भुगतान के लिए प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए।
जेल से कोर्ट लाए जाने वाले कैदियों को नहीं मिलता डाइट अलाउंस, हाईकोर्ट ने डीजी जेल से मांगा हलफनामा
प्रेषित समय :15:20:32 PM / Mon, Jul 13th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर




