इंद्र देव की बारिश भी नहीं रोक पाई सुरों की महफिल, शहीद स्मारक में देर रात तक गूंजते रहे प्रेमांजलि के तराने

इंद्र देव की बारिश भी नहीं रोक पाई सुरों की महफिल, शहीद स्मारक में देर रात तक गूंजते रहे प्रेमांजलि के तराने

प्रेषित समय :18:45:33 PM / Sat, Aug 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. सावन की बारिश के बीच जब शहर में मौसम का मिजाज बदला हुआ था, तब शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में संगीत प्रेमियों के लिए सुरों की ऐसी शाम सजी, जिसने बारिश की रिमझिम को भी पीछे छोड़ दिया. 21 अगस्त को प्रेमांजलि संगीत वृंद की ओर से आयोजित कार्यक्रम “जो तू नहीं तो कुछ भी नहीं” में फिल्मी गीतों, युगल प्रस्तुतियों और काव्यात्मक अंदाज में पेश किए गए संगीत ने देर शाम तक दर्शकों को बांधे रखा. बाहर बारिश का दौर चलता रहा और भीतर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कलाकार एक के बाद एक प्रस्तुति देते रहे.

कार्यक्रम की खासियत यह रही कि इसे केवल गीतों की प्रस्तुति तक सीमित नहीं रखा गया. प्रेमांजलि संगीत वृंद ने महिला शक्ति को केंद्र में रखते हुए कई ऐसी प्रस्तुतियां दीं, जिनमें गीतों के माध्यम से नारी के आत्मविश्वास, भावनाओं और जीवन के विभिन्न रंगों को सामने रखा गया. मंच पर प्रस्तुत गीतों ने कभी प्रेम और विरह का अहसास कराया तो कभी जिंदगी के संघर्ष और उमंग को आवाज दी. “पिया बावरी”, “मेरे ढोलना सुन”, “रुकी रुकी सी जिंदगी”, “मेड इन इंडिया”, “दिल मुझे बता”, “सजना बरखा बाहर आई”, “रंग दिल की धड़कन” और “न जाने क्या हुआ” जैसे गीतों ने माहौल को लगातार संगीतमय बनाए रखा.

कार्यक्रम की शुरुआत से ही दर्शकों की सहभागिता देखने को मिली. कलाकारों की प्रस्तुतियों पर तालियां बजती रहीं और कई मौकों पर श्रोताओं ने गीतों के साथ अपनी आवाज भी मिलाई. आयोजकों के अनुसार बारिश के कारण कार्यक्रम में व्यवधान की आशंका थी, लेकिन संगीत प्रेमियों का उत्साह कम नहीं हुआ. तेज बारिश के बीच भी दर्शक कार्यक्रम स्थल पर मौजूद रहे और प्रस्तुति का आनंद लेते रहे. यही वजह रही कि शाम आगे बढ़ने के साथ कार्यक्रम का उत्साह भी बढ़ता गया.

प्रेमांजलि संगीत वृंद की ओर से कार्यक्रम में एक विशेष मेडल के रूप में कुमारी प्रीत और बेबी नायरा की प्रस्तुति भी आकर्षण का केंद्र रही. दोनों ने फिल्मी गीतों के बीच अपनी गायन प्रतिभा का प्रदर्शन किया. कम उम्र के कलाकारों की प्रस्तुति को दर्शकों ने उत्साह के साथ सराहा. कार्यक्रम में संगीत की विभिन्न शैलियों को एक ही मंच पर जोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे पारंपरिक गायन, फिल्मी संगीत और विशेष प्रस्तुतियों का संतुलित मिश्रण देखने को मिला.

कार्यक्रम में कबीर वाणी की प्रस्तुति भी विशेष रही. राकेश सर ने कबीर के विचारों और वाणी को अपनी प्रस्तुति के माध्यम से सामने रखा. फिल्मी गीतों से सजे कार्यक्रम के बीच कबीर वाणी का यह पड़ाव श्रोताओं के लिए अलग अनुभव रहा. इससे कार्यक्रम में केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि साहित्य और लोकचेतना से जुड़े स्वर भी शामिल हुए. आयोजकों ने विभिन्न विधाओं को एक साथ मंच देने का प्रयास किया, जिसे दर्शकों की प्रतिक्रिया से भी समर्थन मिला.

वाद्य संगत ने भी कार्यक्रम की प्रस्तुतियों को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सुरेंद्र दाहिया जी की टीम की ओर से वादन किया गया, जबकि प्रमोद विरहा जी ने तबले के साथ पंडित गायन में संगत की. तबले की लय ने गीतों और प्रस्तुतियों में अतिरिक्त प्रभाव पैदा किया. विशेष रूप से “मेरे ढोलना” की प्रस्तुति में तबले की संगत ने गीत के भाव और लय को और उभार दिया.

कार्यक्रम के दौरान मंजू दीदी की एंकरिंग भी चर्चा में रही. उन्होंने मंच पर प्रस्तुतियों के क्रम को सहजता से आगे बढ़ाया और अलग-अलग गीतों के बीच दर्शकों से संवाद बनाए रखा. बारिश और देर तक चले कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने मंच संचालन को व्यवस्थित बनाए रखा. आयोजकों ने उनकी भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि कार्यक्रम की गति बनाए रखने में एंकरिंग का महत्वपूर्ण योगदान रहा.

आयोजन में जनप्रतिनिधियों और संगीत क्षेत्र से जुड़े लोगों की मौजूदगी ने भी कार्यक्रम का महत्व बढ़ाया. विधायक पाटन अजय विष्णोई और जबलपुर के प्रसिद्ध संगीतकार बाबूल मेथ्यू का प्रेमांजलि संगीत वृंद की ओर से सम्मान किया गया. संगीत क्षेत्र में योगदान देने वाले कलाकारों और सहयोगियों को मंच पर सम्मानित किए जाने से कार्यक्रम में सांस्कृतिक आयोजन का स्वरूप और मजबूत हुआ.

कार्यक्रम में शहर के अनेक गायकों और कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं. गायिका कलाकार अंजना सक्सेना, पल्लवी फाटक, डॉ. अनामिका श्रीवास्तव, स्मृति केकरे, राखी मजूमदार, मीनल चौधरी, अरुणा नगरकर, शबनम मसीह, रुचिरा श्रीवास्तव, प्रीत श्रीवास्तव, नायरा, के.एम. नगरकर, अरुण गायकी, राजेंद्र गोरे, वसंत कनार्ड, सुधीर श्रीवास्तव, पंकज दुबे और अभिषेक चौरसिया सहित कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं. अलग-अलग आवाजों और संगीत शैलियों ने कार्यक्रम को विविधता प्रदान की.

श्रोताओं के लिए कार्यक्रम का अंतिम दौर भी विशेष रहा. एक के बाद एक युगल गीतों की प्रस्तुतियों ने माहौल को और जीवंत कर दिया. अंतिम प्रस्तुतियों में “जाने कहां गए वो दिन”, “दिल तड़प-तड़प के”, “कोरा कागज था ये मन मेरा”, “सलामे इश्क मेरी जा” और “आजा शाम होने आई” जैसे गीत शामिल रहे. इन गीतों के साथ श्रोताओं की प्रतिक्रियाएं भी लगातार बढ़ती गईं.

आयोजन का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी रहा कि शहर में संगीत की गतिविधियां केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अलग-अलग पीढ़ियों और कलाकारों को एक मंच पर जोड़ने का माध्यम बन रही हैं. एक ही कार्यक्रम में वरिष्ठ कलाकारों के साथ युवा और बाल कलाकारों को अवसर मिलना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है. कुमारी प्रीत और बेबी नायरा जैसी प्रतिभाओं की प्रस्तुति ने यह संकेत दिया कि संगीत की नई पीढ़ी को मंच उपलब्ध कराने की जरूरत लगातार बनी हुई है.

बारिश के बीच आयोजित इस संगीत संध्या का वातावरण इसलिए भी खास रहा कि मौसम ने कार्यक्रम को प्रभावित करने के बजाय उसकी स्मृति को और गहरा कर दिया. शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में सुरों की आवाज और तालियों की गूंज देर तक सुनाई देती रही. कार्यक्रम में मौजूद लोगों के लिए यह शाम केवल गीत सुनने का अवसर नहीं रही, बल्कि पुरानी यादों, लोकप्रिय फिल्मी गीतों और मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से संगीत के साथ जुड़ने का अनुभव बनी.

प्रेमांजलि संगीत वृंद के इस आयोजन ने यह भी दिखाया कि जब प्रस्तुति में विविधता, कलाकारों की मेहनत और श्रोताओं का उत्साह एक साथ जुड़ता है तो साधारण संगीत कार्यक्रम भी यादगार बन जाता है. बारिश के बावजूद दर्शकों की मौजूदगी और कलाकारों के उत्साह ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आयोजकों और कलाकारों के लिए यह शाम इसलिए भी खास रही कि मंच पर प्रस्तुत प्रत्येक गीत के साथ श्रोताओं की प्रतिक्रिया लगातार मिलती रही और कार्यक्रम अपने अंतिम गीत तक ऊर्जा बनाए रखने में सफल रहा.

शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में आयोजित “जो तू नहीं तो कुछ भी नहीं” कार्यक्रम इस मायने में भी अलग रहा कि इसमें प्रेम, विरह, जीवन, नारी शक्ति, लोकवाणी और फिल्मी संगीत के अलग-अलग रंग एक साथ दिखाई दिए. बारिश की बूंदों के बीच सजी यह संगीत संध्या जब समाप्त हुई, तब तक प्रेक्षागृह तालियों और सुरों की स्मृतियों से भर चुका था. प्रेमांजलि संगीत वृंद ने इस आयोजन के माध्यम से शहर के संगीत प्रेमियों को ऐसी शाम दी, जिसकी चर्चा देर तक होती रही.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-