दिल्ली की हवा पर राहत के दावे की खुली पोल, आम दिनों में 14.1% बढ़ा प्रदूषण

दिल्ली की हवा पर राहत के दावे की खुली पोल, आम दिनों में 14.1% बढ़ा प्रदूषण

प्रेषित समय :18:37:01 PM / Wed, Oct 28th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने हवा की गुणवत्ता में सुधार के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक नए विश्लेषण के मुताबिक, 15 सितंबर से 23 अक्टूबर 2026 के बीच दिल्ली के औसत दैनिक वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 15.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, इसी दौरान दैनिक AQI का मध्य मान 14.1 प्रतिशत बढ़ गया. यह विरोधाभास बताता है कि औसत प्रदूषण में कमी आने के बावजूद दिल्लीवासियों को सामान्य दिनों में पहले से अधिक प्रदूषित हवा का सामना करना पड़ा. ऐसे में केवल औसत AQI के आधार पर राजधानी की हवा में सुधार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा.

औसत AQI घटा, लेकिन सामान्य दिनों में बढ़ा प्रदूषण

विश्लेषण के अनुसार, 15 सितंबर से 23 अक्टूबर 2026 के बीच दिल्ली का औसत दैनिक AQI 142.6 रहा, जबकि 2025 में इसी अवधि के दौरान यह 169.3 दर्ज किया गया था. इस तरह औसत में 15.8 प्रतिशत की कमी आई. दूसरी ओर, दैनिक AQI का मध्य मान पिछले साल के 135 से बढ़कर इस साल 154 पहुंच गया.

मध्य मान वह स्तर होता है, जिसके ऊपर और नीचे बराबर संख्या में दैनिक आंकड़े आते हैं. यह प्रदूषण की सामान्य स्थिति को समझने में उपयोगी है, क्योंकि कुछ बेहद प्रदूषित दिन औसत को काफी ऊपर ले जा सकते हैं. इस साल ऐसे दिनों की संख्या कम होने से औसत AQI नीचे आया, लेकिन मध्य मान में बढ़ोतरी ने रोजमर्रा की हवा की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ा दी है.

बेहद प्रदूषित दिनों की संख्या में आई कमी

आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में संबंधित अवधि के दौरान दिल्ली का AQI 200 से ऊपर 10 दिनों तक रहा था. वर्ष 2026 में ऐसे दिनों की संख्या घटकर तीन रह गई. पिछले साल अधिकतम दैनिक AQI 353 तक पहुंचा था, जबकि इस साल यह 245 रहा. इस अवधि में AQI किसी भी दिन 300 के पार नहीं गया.

दैनिक AQI में उतार-चढ़ाव भी अपेक्षाकृत कम रहा. इन बदलावों से संकेत मिलता है कि इस साल प्रदूषण के सबसे गंभीर स्तर वाले दिनों में कमी आई है. हालांकि, सामान्य दिनों में प्रदूषण का बढ़ना बताता है कि समस्या का समाधान अभी नहीं हुआ है. वायु गुणवत्ता का आकलन करते समय अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों के साथ उन दिनों को भी महत्व देना जरूरी है, जब लोग नियमित रूप से घर से बाहर निकलते हैं, काम पर जाते हैं और खुले वातावरण में समय बिताते हैं.

पराली जलाने की घटनाओं में मामूली गिरावट

दिल्ली के प्रदूषण के संदर्भ में पंजाब और हरियाणा में धान की पराली जलाने की घटनाओं पर लगातार नजर रखी जाती है. फसल कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं अनुकूल मौसमी परिस्थितियों में दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच सकता है. लेकिन इस साल के आंकड़े बताते हैं कि पराली जलाने की घटनाओं और दिल्ली के AQI के बीच संबंध को केवल आग की संख्या के आधार पर नहीं समझा जा सकता.

15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच पंजाब और हरियाणा में उपग्रह आधारित निगरानी के दौरान दर्ज आग की संयुक्त घटनाएं 2025 में 201 थीं, जो 2026 में घटकर 193 रह गईं. यह करीब चार प्रतिशत की कमी है. इसके बावजूद, दिल्ली के विस्तारित विश्लेषण में औसत AQI 15.8 प्रतिशत कम दर्ज किया गया.

इससे पहले 2024 से 2025 के बीच दोनों राज्यों में पराली की आग की घटनाओं में 88 प्रतिशत की कमी आई थी, लेकिन दिल्ली के औसत AQI में केवल 3.9 प्रतिशत गिरावट आई. वहीं, दिल्ली के दैनिक AQI और पराली की आग के बीच उसी दिन का सांख्यिकीय सहसंबंध 2025 के 0.619 से घटकर 2026 में 0.170 रह गया. इससे पता चलता है कि दिल्ली की हवा पर कई कारकों का एक साथ प्रभाव पड़ता है.

हवा की दिशा और बारिश की भी अहम भूमिका

क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बाल्यान के मुताबिक, पराली जलाने से निकलने वाला धुआं हर साल दिल्ली की हवा को एक समान तरीके से प्रभावित नहीं करता. हवा की दिशा और रफ्तार, बारिश तथा वातावरण में प्रदूषकों के ऊपर-नीचे फैलने की परिस्थितियां तय करती हैं कि धुआं दिल्ली तक पहुंचेगा, रास्ते में बिखरेगा या वातावरण से हट जाएगा.

इसलिए उपग्रह से प्राप्त आग की जानकारी को रोजाना के AQI और मौसम संबंधी आंकड़ों के साथ देखना जरूरी है. इसके अलावा, वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों और अन्य स्थानीय स्रोतों से होने वाला उत्सर्जन भी राजधानी की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करता है. पराली जलाने की घटनाओं में कमी अपने आप दिल्ली की हवा साफ होने की गारंटी नहीं देती.

अल नीनो के बीच मौसम के मिले-जुले संकेत

प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने की संभावना भी मौसमी परिस्थितियों के विश्लेषण को महत्वपूर्ण बनाती है. अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के 8 अक्टूबर 2026 के आकलन के मुताबिक, नीनो-3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान का अंतर लगभग 2.1 डिग्री सेल्सियस था. एजेंसी ने जनवरी से मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो की स्थिति बने रहने की 83 प्रतिशत से अधिक संभावना जताई थी.

हालांकि, अल नीनो को सीधे तौर पर दिल्ली में अधिक या कम प्रदूषण का संकेतक नहीं माना जा सकता. इसका प्रभाव क्षेत्रीय मौसम, बारिश, तापमान, हवा की दिशा और वातावरण की स्थिरता के साथ मिलकर सामने आता है.

15 सितंबर से 23 अक्टूबर की अवधि के मौसम संबंधी मॉडल आंकड़ों की तुलना में औसत तापमान लगभग समान रहा. औसत हवा की रफ्तार 2.40 मीटर प्रति सेकंड से बढ़कर 2.45 मीटर प्रति सेकंड हो गई. हवा की रफ्तार बढ़ने से प्रदूषकों के फैलाव में मदद मिल सकती है, लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करता है कि हवा प्रदूषकों को किस दिशा में ले जाती है.

दूसरी ओर, वातावरण में प्रदूषकों के फैलने के लिए उपलब्ध ऊर्ध्वाधर परत की औसत ऊंचाई 846 मीटर से घटकर लगभग 810 मीटर रह गई. बारिश भी 46.70 मिलीमीटर से घटकर 10.19 मिलीमीटर रह गई. बारिश हवा से कुछ प्रदूषक कणों को हटाने में मदद करती है, इसलिए कम बारिश को प्रदूषण में गिरावट की वजह नहीं माना जा सकता. ये आंकड़े NOAA के ग्लोबल फोरकास्ट सिस्टम के मॉडल पर आधारित हैं, न कि स्थानीय मौसम केंद्रों के प्रत्यक्ष अवलोकनों पर. इस कारण दिल्ली के AQI में बदलाव में मौसम की सटीक भूमिका तय करने के लिए अतिरिक्त अध्ययन जरूरी है.

विशेषज्ञों ने जलवायु और प्रदूषण के संबंध को समझने पर दिया जोर

आईआईटी दिल्ली के वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र के प्रमुख और नीति अध्ययन के विपुला एवं महेश चतुर्वेदी चेयर प्रोफेसर डॉ. सग्निक डे ने कहा कि अल नीनो को वायु प्रदूषण का सीधा संकेतक नहीं मानना चाहिए. क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता पर इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि जलवायु में होने वाले बदलाव स्थानीय बारिश, तापमान, हवा के पैटर्न और वातावरण की स्थिरता के साथ कैसे जुड़ते हैं.

उन्होंने जलवायु परिवर्तनशीलता और मानवीय गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के प्रभावों को अलग-अलग समझने की जरूरत पर जोर दिया. इससे प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करने और नियंत्रण के लिए प्रभावी नीतियां तैयार करने में मदद मिल सकती है.

लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेना स्वास्थ्य के लिए खतरा

दिल्ली में वायु प्रदूषण का असर केवल उन दिनों तक सीमित नहीं रहता, जब AQI बेहद खराब स्तर पर पहुंच जाता है. लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं. बच्चों के फेफड़ों के विकास, वयस्कों के हृदय और फेफड़ों के स्वास्थ्य तथा पहले से जोखिम वाले लोगों की स्थिति पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है.

एम्स, दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने कहा कि दिल्ली के लोगों ने वर्षों तक प्रदूषित हवा का सामना किया है. लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहना बीमारी का बोझ बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक है. उन्होंने बच्चों के फेफड़ों की सुरक्षा, जोखिम वाले वयस्कों में हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों की समय पर जांच तथा साफ हवा को सालभर का सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा बनाने पर जोर दिया.

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के मुताबिक, औसत AQI में गिरावट राहत का संकेत हो सकती है, लेकिन आम दिनों में प्रदूषण बढ़ना एक अलग वास्तविकता सामने लाता है. उनके अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण की सफलता का आकलन केवल सबसे खराब दिनों की संख्या या औसत AQI से नहीं, बल्कि सामान्य दिनों की हवा में लगातार सुधार के आधार पर भी किया जाना चाहिए.

कुल मिलाकर, दिल्ली की हवा में इस साल आए बदलाव को किसी एक कारण से जोड़ना मुश्किल है. पराली जलाने की घटनाएं, स्थानीय उत्सर्जन, हवा की दिशा और गति, बारिश तथा वातावरण में प्रदूषकों के फैलाव की परिस्थितियां मिलकर वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं. सबसे प्रदूषित दिनों में कमी जरूर आई है, लेकिन दैनिक AQI का बढ़ा हुआ मध्य मान बताता है कि राजधानी में साफ हवा की चुनौती अब भी कायम है. वास्तविक सुधार तभी माना जाएगा, जब दिल्लीवासियों को केवल कुछ दिनों में नहीं, बल्कि पूरे साल सामान्य दिनों में भी अपेक्षाकृत स्वच्छ हवा मिल सके.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-