सरकारी भूल का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेगा, हाईकोर्ट ने रिकवरी पर लगाई रोक

सरकारी भूल का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेगा, हाईकोर्ट ने रिकवरी पर लगाई रोक

प्रेषित समय :17:38:51 PM / Mon, Jun 29th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि विभागीय अधिकारियों की गलती का आर्थिक बोझ किसी कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता। यदि वेतन निर्धारण में हुई त्रुटि के लिए कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं रही है, तो उससे अतिरिक्त भुगतान की राशि की वसूली करना न केवल अनुचित है बल्कि कानून की भावना के भी विपरीत है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए तृतीय श्रेणी कर्मचारी से की जा रही रिकवरी पर रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि वेतन निर्धारण करने वाले अधिकारियों की त्रुटि का दंड उस कर्मचारी को नहीं दिया जा सकता, जिसने न तो वेतन तय किया और न ही भुगतान प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप किया।
                                                              यह मामला मनोज कुमार सिंह से संबंधित है, जिन्हें विभाग द्वारा सब-इंस्पेक्टर के संशोधित वेतनमान का लाभ निर्धारित समय से पहले प्रदान कर दिया गया था। राज्य सरकार का तर्क था कि सात नवंबर 2007 को जारी परिपत्र के अनुसार संशोधित वेतनमान एक सितंबर 2007 से प्रभावी होना चाहिए था, जबकि संबंधित कर्मचारी को यह लाभ एक अप्रैल 2006 से ही दे दिया गया। सरकार के अनुसार अप्रैल 2006 से अगस्त 2007 तक कर्मचारी को अधिक वेतन का भुगतान हुआ, इसलिए उस अतिरिक्त राशि की रिकवरी की जानी आवश्यक है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने पहले रिकवरी की कार्रवाई की और बाद में अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए पुनर्विचार याचिका भी दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि मनोज कुमार सिंह वेतन निर्धारण की प्रक्रिया से किसी भी प्रकार से जुड़े नहीं थे। वह न तो ड्राइंग एवं डिस्बर्सिंग अधिकारी थे और न ही वेतन निर्धारण करने वाले सक्षम अधिकारी। वे केवल तृतीय श्रेणी कर्मचारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। कर्मचारी की ओर से अधिवक्ता सचिन पांडे ने अदालत को बताया कि वेतन निर्धारण पूरी तरह विभागीय अधिकारियों द्वारा किया गया था और उसमें कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं थी। ऐसे में विभागीय त्रुटि के लिए कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित रफीक मसीह प्रकरण का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह सिद्धांत स्थापित कर चुका है कि यदि किसी कर्मचारी ने किसी प्रकार का छल, कपट या गलत जानकारी देकर अतिरिक्त भुगतान प्राप्त नहीं किया है और भुगतान विभागीय भूल के कारण हुआ है, तो विशेष रूप से निम्न श्रेणी के कर्मचारियों से उस राशि की रिकवरी नहीं की जा सकती। इस सिद्धांत का उद्देश्य ऐसे कर्मचारियों को अनावश्यक आर्थिक संकट से बचाना है, जो विभागीय निर्णयों पर निर्भर रहते हैं और वेतन निर्धारण में उनका कोई अधिकार या हस्तक्षेप नहीं होता। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि यदि वेतन निर्धारण में कोई गलती हुई है तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी, जिन्होंने नियमों की व्याख्या या क्रियान्वयन में त्रुटि की। ऐसी स्थिति में विभाग अपनी ही लापरवाही का भार कर्मचारी पर नहीं डाल सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका तभी स्वीकार की जाती है, जब निर्णय में कोई स्पष्ट त्रुटि या नया महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए, लेकिन इस मामले में राज्य सरकार ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत तर्क पहले भी विचाराधीन रह चुके हैं और उन पर न्यायालय अपना निर्णय दे चुका है। ऐसे में पुनर्विचार के नाम पर उसी विषय को दोबारा उठाने का कोई औचित्य नहीं बनता। परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका निरस्त कर दी और कर्मचारी से अतिरिक्त भुगतान की राशि वसूलने के प्रयास को अस्वीकार कर दिया। इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रशासनिक या विभागीय लापरवाही का दंड उन कर्मचारियों को नहीं दिया जा सकता, जिन्होंने किसी प्रकार की गलती नहीं की है। यदि भुगतान विभाग के आदेशों के आधार पर हुआ है और कर्मचारी ने सद्भावना में उसे स्वीकार किया है, तो वर्षों बाद रिकवरी की कार्रवाई करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहां विभागीय त्रुटियों के कारण कर्मचारियों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली की जाती है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले के माध्यम से यह दोहराया है कि प्रशासनिक जवाबदेही अधिकारियों की होती है और उनकी भूल का आर्थिक भार कर्मचारियों पर नहीं थोपा जा सकता। अदालत के इस निर्णय से उन हजारों कर्मचारियों को भी राहत मिलने की उम्मीद है, जो विभागीय त्रुटियों के कारण रिकवरी जैसी कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-