जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने वेतन पुनरीक्षण और पेंशन निर्धारण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारी या पेंशनभोगी वेतन पुनरीक्षण के समय स्वेच्छा से चुने गए विकल्प को बाद में बदलकर अतिरिक्त वित्तीय लाभ का दावा नहीं कर सकते। अदालत ने यह भी कहा कि संशोधित वेतनमान स्वीकार करने के बाद पुरानी वेतन व्यवस्था के आधार पर अतिरिक्त वेतनवृद्धि जोड़कर पेंशन का पुनर्निर्धारण और एरियर की मांग करना नियमों के विपरीत है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका को खारिज कर दिया।
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने की। अदालत के समक्ष पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से याचिका प्रस्तुत की गई थी, जिसमें अतिरिक्त वेतनवृद्धि को आधार बनाकर पेंशन में बढ़ोतरी करने तथा एरियर का भुगतान कराने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अतिरिक्त इंक्रीमेंट को वेतन का हिस्सा मानते हुए पेंशन का पुनर्निर्धारण किया जाए और उसके अनुसार बकाया राशि का भी भुगतान किया जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के प्रावधानों का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि नियम-नौ के अंतर्गत कर्मचारियों को वेतन पुनरीक्षण के समय स्पष्ट रूप से दो विकल्प उपलब्ध कराए गए थे। कर्मचारी अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक विकल्प का चयन कर सकते थे, लेकिन एक बार विकल्प चुन लेने के बाद उसे बदलने या उसके विपरीत लाभ लेने का अधिकार नहीं दिया गया है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने एक जनवरी 2006 से संशोधित वेतनमान लागू करने का विकल्प स्वीकार किया है तो वह बाद में पुरानी वेतन व्यवस्था के आधार पर अतिरिक्त वेतनवृद्धि जोड़कर पेंशन में वृद्धि और एरियर का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विकल्प चुनने की स्वतंत्रता अवश्य दी गई है, लेकिन उसके परिणामों को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है। नियमों के अनुरूप लिया गया निर्णय बाद में केवल अतिरिक्त आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से बदला नहीं जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि किसी कर्मचारी को एक ही मामले में दोहरी वित्तीय सुविधा देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि संशोधित वेतनमान का लाभ पहले ही प्राप्त कर लिया गया है तो उसी अवधि के लिए पुरानी वेतन व्यवस्था के आधार पर अतिरिक्त लाभ की मांग न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती। ऐसा करना नियमों की मूल भावना के विपरीत होगा और इससे समानता के सिद्धांत पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के नियम-नौ को पूरी तरह वैध ठहराया। अदालत ने कहा कि यह नियम कर्मचारियों को स्पष्ट विकल्प प्रदान करता है और उसके क्रियान्वयन में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है। इसलिए इस नियम को चुनौती देने अथवा उसके विपरीत अतिरिक्त वित्तीय लाभ की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। युगलपीठ ने माना कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत तर्क नियमों और वेतन पुनरीक्षण व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं। अदालत ने कहा कि पेंशन निर्धारण के लिए वही आधार मान्य होगा, जो कर्मचारी द्वारा विधिवत चुने गए विकल्प के अनुसार लागू हुआ था। बाद में अतिरिक्त वेतनवृद्धि जोड़कर पेंशन और एरियर की मांग करना स्वीकार्य नहीं है। इन्हीं तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका निरस्त कर दी। अदालत के इस फैसले को वेतन पुनरीक्षण और पेंशन संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कर्मचारी या पेंशनभोगी एक साथ दो अलग-अलग वित्तीय व्यवस्थाओं का लाभ नहीं ले सकते। वेतन पुनरीक्षण के समय स्वेच्छा से चुना गया विकल्प अंतिम माना जाएगा और उसके बाद उसी विषय पर अतिरिक्त पेंशन, एरियर या अन्य आर्थिक लाभ का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
पेंशन और एरियर बढ़ाने की मांग पर हाईकोर्ट का बड़ा झटका, याचिका खारिज
प्रेषित समय :17:42:37 PM / Mon, Jun 29th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर




