जलवायु परिवर्तन का गर्भ में पल रहे बच्चों पर कहर, भारत में गर्मी से जुड़े 8,830 प्रीमैच्योर जन्म का अनुमान

जलवायु परिवर्तन का गर्भ में पल रहे बच्चों पर कहर, भारत में गर्मी से जुड़े 8,830 प्रीमैच्योर जन्म का अनुमान

प्रेषित समय :22:04:08 PM / Tue, Nov 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जलवायु परिवर्तन की चर्चा अक्सर बढ़ते तापमान, सूखे, बाढ़, जंगलों में आग और समुद्र के बढ़ते जलस्तर के संदर्भ में होती है. लेकिन इस संकट का एक ऐसा पहलू भी है, जो सीधे मां और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ा है. भीषण गर्मी केवल शरीर को थकाती नहीं, बल्कि गर्भावस्था के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है. अप्रैल 2024 में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पड़ी असाधारण गर्मी के दौरान भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस में समय से पहले बच्चों के जन्म यानी प्रीमैच्योर बर्थ के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी का अनुमान सामने आया है. Zero Carbon Analytics (ZCA) के एक अध्ययन के मुताबिक, इन तीन देशों में सामान्य अप्रैल की तुलना में लगभग 16,150 अतिरिक्त प्रीमैच्योर जन्म हुए. इनमें से करीब 10,600 मामलों को मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा गया है. भारत में अकेले 8,830 ऐसे अतिरिक्त जन्मों का अनुमान है. यह आंकड़ा बताता है कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि मातृ और नवजात स्वास्थ्य की भी बड़ी चुनौती बन चुका है.

अध्ययन में अप्रैल 2024 की गर्मी और प्रीमैच्योर जन्मों के बीच संबंध का आकलन किया गया है. शोध के अनुसार, भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस में उस महीने सामान्य परिस्थितियों की तुलना में लगभग 16,150 अतिरिक्त समयपूर्व जन्म हुए. इन तीनों देशों में इसका प्रभाव अलग-अलग स्तर पर दर्ज किया गया. भारत में प्रीमैच्योर जन्मों में 3.6 प्रतिशत, बांग्लादेश में 11.9 प्रतिशत और फिलीपींस में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया.

हालांकि, अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष 10,600 अतिरिक्त जन्मों से जुड़ा है. शोधकर्ताओं ने इनमें उन मामलों को अलग किया, जिन्हें मानव गतिविधियों के कारण बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग से संबंधित माना गया है. इस विश्लेषण के अनुसार, भारत में 8,830, बांग्लादेश में 1,479 और फिलीपींस में 263 अतिरिक्त प्रीमैच्योर जन्म जलवायु परिवर्तन से जुड़े पाए गए.

इन दोनों आंकड़ों को अलग-अलग समझना जरूरी है. 16,150 का आंकड़ा तीनों देशों में गर्मी के दौरान हुए कुल अतिरिक्त प्रीमैच्योर जन्मों का अनुमान है, जबकि 10,600 उन अतिरिक्त मामलों को दर्शाता है जिन्हें मानवजनित जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जोड़ा गया है.

भारत के चार राज्यों में सबसे अधिक जोखिम

अध्ययन का एक चिंताजनक पहलू भारत के भीतर क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर है. बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड में देश के कुल अतिरिक्त प्रीमैच्योर जन्मों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा होने का अनुमान लगाया गया है. ये ऐसे राज्य हैं, जहां बड़ी आबादी, गर्मी का लंबा मौसम और कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच पहले से ही चुनौती बनी हुई है.

इन राज्यों में बड़ी संख्या में लोग खुले वातावरण में काम करते हैं. कृषि, निर्माण कार्य, छोटे उद्योगों और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं के लिए अत्यधिक गर्मी से बचना आसान नहीं होता. गर्भावस्था के दौरान लंबे समय तक गर्म वातावरण में रहना, पर्याप्त पानी और आराम न मिलना तथा पौष्टिक भोजन की कमी जोखिम को और गंभीर बना सकती है.

भारत के लिए यह चेतावनी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि गर्मी की लहरों का प्रभाव अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में भी तापमान बढ़ने के साथ स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां बढ़ रही हैं.

ZCA के अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशिया में अप्रैल 2024 जैसी भीषण गर्मी की घटना मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 45 गुना अधिक संभावित हो गई थी. फिलीपींस में तो मानवजनित जलवायु परिवर्तन के बिना इस तरह की गर्मी की घटना लगभग असंभव मानी गई.

इसका अर्थ है कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल, औद्योगिक गतिविधियों और अन्य मानवीय कारणों से वातावरण में बढ़ती ग्रीनहाउस गैसों ने ऐसी गर्म घटनाओं की संभावना को बढ़ाया है. तापमान में यह वृद्धि केवल मौसम के आंकड़ों में बदलाव नहीं है, बल्कि इसका असर लोगों के जीवन, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर भी पड़ रहा है.

2050 तक सामान्य अप्रैल भी बन सकता है स्वास्थ्य संकट

अध्ययन ने भविष्य के तापमान अनुमानों के आधार पर भारत और बांग्लादेश में 2050 के आसपास प्रीमैच्योर जन्मों के संभावित बोझ का भी आकलन किया है. इसके लिए अलग-अलग स्तर के ग्लोबल वार्मिंग वाले जलवायु परिदृश्यों को ध्यान में रखा गया.

शोध का अनुमान है कि सदी के मध्य तक भारत में एक सामान्य अप्रैल के दौरान ही 15,000 से अधिक अतिरिक्त प्रीमैच्योर जन्म हो सकते हैं. यह अनुमान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है कि भविष्य का सामान्य अप्रैल भी 2024 के असाधारण रूप से गर्म अप्रैल से अधिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है.

भारत में उत्तर प्रदेश पर सबसे अधिक असर पड़ने का अनुमान है. इसके बाद बिहार और राजस्थान का स्थान बताया गया है. बांग्लादेश में भी सामान्य अप्रैल के दौरान लगभग 1,500 अतिरिक्त प्रीमैच्योर जन्म होने की आशंका जताई गई है. वहां ढाका डिवीजन सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है, जबकि चटगांव और राजशाही में भी जोखिम बढ़ने का अनुमान है.

प्रीमैच्योर जन्म का मतलब है कि बच्चे का जन्म गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले हो जाए. ऐसे बच्चों के अंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते और उन्हें जन्म के बाद विशेष चिकित्सा देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं में सांस लेने की परेशानी, संक्रमण, कम वजन और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम अधिक रहता है.

कुछ बच्चों को जीवन के शुरुआती वर्षों में ही नहीं, बल्कि आगे चलकर भी शारीरिक विकास, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. समय से पहले जन्म दुनिया भर में नवजात शिशुओं की मृत्यु का एक प्रमुख कारण है.

गर्भवती महिलाओं के लिए भी अत्यधिक गर्मी चिंता का विषय है. गर्म वातावरण में शरीर का तापमान नियंत्रित रखना मुश्किल हो सकता है. निर्जलीकरण, अत्यधिक थकान और गर्मी से जुड़ी दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं गर्भावस्था को प्रभावित कर सकती हैं. हालांकि हर प्रीमैच्योर जन्म का कारण गर्मी नहीं होती, लेकिन अध्ययन बताता है कि बढ़ता तापमान इस जोखिम को बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है.

AIIMS गुवाहाटी में कम्युनिटी एंड फैमिली मेडिसिन विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर और जलवायु परिवर्तन की नोडल अधिकारी डॉ. रश्मि अग्रवाल्ला के मुताबिक, भारत जैसे जलवायु जोखिम वाले देशों में गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशु अत्यधिक गर्मी के प्रभाव के प्रति संवेदनशील हैं.

उनके अनुसार, एनीमिया, खराब पोषण और लंबे समय तक खुले में काम करना गर्भवती महिलाओं के लिए गर्मी से जुड़े जोखिम को बढ़ा सकता है. कई महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान भी काम जारी रखना पड़ता है. खेतों, निर्माण स्थलों और अन्य खुले कार्यस्थलों पर काम करने वाली महिलाओं के लिए दोपहर की तेज गर्मी से बचना हमेशा संभव नहीं होता.

ऐसे में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में गर्मी से बचाव को भी नियमित सलाह का हिस्सा बनाना जरूरी है. गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त पानी पीने, गर्म समय में शारीरिक मेहनत कम करने, आराम करने और स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर समय रहते चिकित्सा सहायता लेने के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए.

गर्मी से बचाव को मिले प्राथमिकता

ZCA की रिपोर्ट की मुख्य लेखिका और सीनियर रिसर्च एनालिस्ट डॉ. जोआन बेंटली-मैकक्यून के मुताबिक, बढ़ता तापमान भीषण गर्मी की घटनाओं को अधिक बार और अधिक तीव्र बना रहा है. इससे समय से पहले प्रसव का जोखिम बढ़ सकता है और बच्चों के स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है.

उनका मानना है कि बेहतर प्रसवपूर्व देखभाल, ठंडक वाली जगहों तक पहुंच और समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्थाएं जोखिम कम करने में मददगार हो सकती हैं. लेकिन केवल स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार पर्याप्त नहीं होगा. जलवायु परिवर्तन को सीमित करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना भी जरूरी है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस की मौजूदा मातृ स्वास्थ्य नीतियों और हीट एक्शन प्लान में गर्भवती महिलाओं तथा नवजात शिशुओं को गर्मी से बचाने के उपाय व्यवस्थित रूप से शामिल नहीं हैं. अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में गर्मी से जुड़े जोखिम की पहचान, गर्भवती महिलाओं के लिए ठंडे स्थानों की उपलब्धता और स्थानीय स्तर पर चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है.

मातृ स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत

यह मुद्दा ऐसे समय सामने आया है, जब COP31 सम्मेलन में स्वास्थ्य को प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किए जाने की चर्चा है. WHO, WMO, UNICEF और UNFPA ने भी गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं और बच्चों पर अत्यधिक गर्मी के स्वास्थ्य जोखिमों को समझने और ट्रैक करने के लिए वैश्विक फ्रेमवर्क शुरू किया है.

इस पहल का महत्व इसलिए है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का आकलन केवल तापमान के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता. यह भी समझना होगा कि किन क्षेत्रों में गर्भवती महिलाएं अधिक जोखिम में हैं, स्वास्थ्य सेवाएं कितनी तैयार हैं और जरूरत के समय उन्हें किस तरह की सहायता मिल सकती है.

अप्रैल 2024 के आंकड़े एक गंभीर संदेश देते हैं. जलवायु परिवर्तन का असर अब आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य तक पहुंच रहा है. भारत में बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों के लिए यह चेतावनी विशेष महत्व रखती है. आने वाले वर्षों में बढ़ती गर्मी के साथ इस चुनौती का विस्तार हो सकता है. इसलिए मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को जलवायु जोखिम के अनुरूप तैयार करना, गर्भवती महिलाओं को गर्मी से सुरक्षा देना और जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन को कम करना समय की जरूरत है. जलवायु परिवर्तन से लड़ाई अब केवल धरती को बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि मां और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा का सवाल भी बन चुकी है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-