समग्र

आपदा में राहत: हर जिले में फौरन खुले मेडिकल कॉलेज

फिलहाल कोरोना महामारी से देश ही नहीं अपितु समूचा जूझ रहा है.किसी को कुछ नहीं सूझ रहा है कि इस संकट का समाधान कैसा होगा.सारे संसाधन नाकाफी साबित हुए.साधन संपन्न कहे जाने वाले मूल्कों की हालत भी बद से बदतर है.त्रासदी में देश की चिकित्सा व्यवस्था की कलाई खुल गई.वो तो गनिमत है कि में वक्त पर जन सहयोग, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयं सेवी संस्थाएं और स्वदेशी उद्योग पतियों आदियों के समर्पण से स्थिति थोड़ी सी नियंत्रण में दिखाई पड़ी.जानकार तो कहते हैं कि आने वाले समय में कोरोना की तीसरी लहर आएगी, जो और भयावह होगी.इससे बचने का एकमेव उपाय दिखाई पड़ता है स्वास्थ्य सुविधाओ में भरपूर इजाफा.जिसकी कमी सदियों से खल रही है.ना जाने ये अब तक क्यों पूरी नहीं हो पाई? खैर अब अगर-मगर समय नहीं है.अब तो तत्काल समस्या का समाधान निकालने की बारी है। इस दिशा में एक निर्णायक कड़ी साबित हो सकती है, देश के हर जिले में फौरन खुले मेडिकल कॉलेज.जिसके इर्द-गिर्द ही हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था घूमती है.लिहाजा आपदा में राहत कहें या अवसर लगे हाथ सरकार को बिना देर गंवाए हर जिले में एक साथ मेडिकल कॉलेज की मंजूरी दे देना चाहिए.तभी ही आने वाले समय और पीड़ियों के लिए कुछ हालत में स्वास्थ्य सेवाएं कुछ हद तक मुकम्मल हो पाएंगी.वरना एक डॉक्टर, एक अस्पताल हजारों लोगों की जान बचाएगा या लेगा समझ से परे है? परिस्थिति कुछ यूं ही बयां कर रही है. जहां डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 1 हजार व्यक्ति पर एक डॉक्टर हरहाल में होना चाहिए.वहां आज देश में हजारों व्यक्तियों के बीच में एक डॉक्टर है.फिर कैसे लोगों का समग्र उपचार होगा.यह अनसुलझी पहेली विपदा में और कहर बरपाती है.वहीं चिकित्सा व्यवस्था के नाम पर जिला चिकित्सालय, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप स्वास्थ्य केंद्र तो दिखते है, लेकिन वहां चिकित्सक नहीं है, उपयोगी सुविधाएं नहीं हैं .खासतौर पर छोटे शहरों और ग्रामीण अंचलों में एक योग्य चिकित्सक, सुलभ अस्पताल को ढूंढना, दिन में तारे देखने का समान है.आखिर! ऐसा कब तक चलेगा.क्या इन रहवासियों को अपना इलाज करवाने का वाजिब हक नहीं है? ये कब तक समग्र उपचार से महरूम रहेंगे? इस ओर हमारे जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और सरकारों को विशेष ध्यान देने की नितांत आवश्यकता है.नहीं तो कोरोना समेत दूसरे संक्रमण, रोग और कहर आमजन को जीते जी काल के गाल में समा देंगे. व्यथा में सारा दोष चिकित्सकों के माथे मढ़ना ठीक नहीं होगा.जब देश में वैसे ही चिकित्सक ही कम है, तो वे कैसे हर जगह अपनी सेवाएं दे पाएंगे! कुछ अभी दे रहे हैं.जो देना चाहते हैं वह भी संसाधनों, स्थाई रोजगार, वेतन की अल्पता, उच्च शिक्षा का महौल और सुविधाओं के अभाव में यहां जाने से कतराते हैं.कुछेक महानुभावों को तो देश यही अच्छा नहीं लगता.वो पढ़ते स्वदेश में है और कमाते परदेश में है.समस्या बड़ी गंभीर है, लेकिन निदान तो खोजना ही होगा.वह मात्र दिखाई पड़ता है देश के हरेक जिलों में स्नातकोत्तर स्तर के मेडिकल कॉलेज खोलने के कारगर उपाय को अमलीजामा पहनाने की जमीनीं पहल से.हां! वह भी न्यूनतम शुल्क के इंतेज़ाम सहित.ताकि यहां इच्छुक योग्यता धारी आम आदमी के बच्चे भी निर्बाध तालिम हासिल कर सकें. अभिभूत, इस एक काम, कई काज से समय रहते विपरीत परिस्थितियों का सामना होगा.अलावे इसके मूलभूत फायदे भी होंगे.पहला तो मुकम्मल इलाज मिलेगा.दूसरा इलाज के लिए हर बरस हजारों डाक्टर.तीसरा बढ़ेंगे संसाधन युक्त अस्पताल.चौथा बढ़ेंगी रोजगार की संभावनाएं.फिर देखते हैं संख्या बढ़ने पर गांवों में इलाज करने कैसे नहीं जाते डाक्टर.नहीं जाएंगे तो गली-गली में खुल जाएंगे दवाखाना.यह भी जनता के लिए डाक्टरों में प्रतिस्पर्धा होने से फायदा का ही सौदा साबित होगा। बस ज़रूरत है तो दृढ़ जन संकल्प की.महत्वपूर्ण इसके लिए हमारी सरकारों के पास पैसें की कोई कमी नहीं है.होती भी है तो बस इतना ही करना है रक्षा, कृषि, कानून, गृह, विज्ञान, रोजगार और शिक्षा जैसे बुनियादी विभागों विभागों को छोड़कर बाकी विभागों के बजट में केवल और केवल 1 साल के लिए कटौती करके स्वास्थ्य व्यवस्था में लगा दीजिए.बाद देखिए कमाल कुछ सालों में ही देश की जीवनपयोगी स्वास्थ्य सेवाएं जन-जन तक सुलभता से पहुंचने लगेगी.कवायद में हमें भी अंगदान और शवदान करने आगे आना होगा, जिसकी हालिया बहुत कमी महसूस होती है.फलीभूत हमारे भविष्य शारीरिक प्रायोगिक परीक्षण और ज्ञान लेकर एक कुशल चिकित्सक बनकर मानव जीवन को बचाने में सफल हो.येही वक्त की नजाकत और देश की निहायत ज़रूरत है।

हेमेन्द्र क्षीरसागर के अन्य अभिमत

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