आकर्षक विज्ञापन, चमकदार पैकेजिंग और भ्रामक दावे

भारत का पोषण परिदृश्य तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. लंबे समय तक सार्वजनिक नीति का केंद्र भूख, कुपोषण और खाद्य उपलब्धता रहा, परंतु आज देश दोहरे पोषण संकट का सामना कर रहा है. एक ओर बच्चों और महिलाओं में अल्पपोषण, रक्ताल्पता और अवरुद्ध वृद्धि जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं, तो दूसरी ओर मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी असंचारी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं. यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय विकास से भी जुड़ी हुई है.

इस परिवर्तन के पीछे खाद्य उपभोग की आदतों में आया बदलाव एक महत्त्वपूर्ण कारण है. पारंपरिक घरेलू भोजन की जगह अब डिब्बाबंद, पैकेटबंद और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ी है. इन उत्पादों में प्रायः शर्करा, नमक और संतृप्त वसा की मात्रा अधिक होती है. आकर्षक विज्ञापन, चमकदार पैकेजिंग और भ्रामक दावे उपभोक्ताओं को यह विश्वास दिलाते हैं कि ये उत्पाद सुरक्षित या स्वास्थ्यवर्धक हैं. परिणामस्वरूप उपभोक्ता वास्तविक पोषण मूल्य को समझे बिना निर्णय ले लेते हैं.

ऐसे परिवेश में पैकेज के अग्रभाग पर स्पष्ट और सरल लेबलिंग की आवश्यकता उभरकर सामने आती है. पारंपरिक पोषण तालिकाएँ प्रायः पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती हैं, जिन्हें समझना सामान्य उपभोक्ता के लिए कठिन होता है. इसके विपरीत, पैकेज के सामने बड़े और स्पष्ट संकेत—जैसे “उच्च शर्करा”, “उच्च नमक” या “उच्च वसा”—उपभोक्ता को तुरंत सचेत कर सकते हैं. यह व्यवस्था सूचना को जटिलता से निकालकर व्यवहारिक स्तर पर उपलब्ध कराती है.

सूचित विकल्प का अधिकार उपभोक्ता संरक्षण का मूल आधार है. किंतु भोजन के संदर्भ में यह अधिकार केवल बाज़ार संबंधी नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा हुआ है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसकी न्यायिक व्याख्या में स्वास्थ्य का अधिकार भी सम्मिलित है. यदि नागरिक को यह जानकारी ही उपलब्ध न हो कि कोई खाद्य पदार्थ उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है या नहीं, तो जीवन के अधिकार की सार्थकता अधूरी रह जाती है. अतः स्पष्ट लेबलिंग स्वास्थ्य के संवैधानिक अधिकार को व्यावहारिक रूप देने का साधन बन सकती है.

बाज़ार व्यवस्था में उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सूचना का असंतुलन एक सामान्य स्थिति है. उत्पादक को अपने उत्पाद की संरचना, अवयवों और संभावित प्रभावों की पूरी जानकारी होती है, जबकि उपभोक्ता सीमित जानकारी के आधार पर निर्णय लेता है. पैकेज के अग्रभाग पर लेबलिंग इस असंतुलन को कम करने का प्रयास करती है. जब जानकारी सरल, प्रत्यक्ष और चेतावनी के रूप में दी जाती है, तो उपभोक्ता अधिक सजग होकर चयन करता है.

अंतरराष्ट्रीय अनुभव इस दृष्टिकोण की प्रभावशीलता को प्रमाणित करते हैं. उदाहरण के लिए, चिली में लागू स्पष्ट चेतावनी लेबलों के बाद उच्च शर्करा और उच्च वसा वाले उत्पादों की खपत में कमी देखी गई. इससे यह सिद्ध होता है कि यदि जानकारी सुलभ और स्पष्ट हो, तो उपभोक्ता व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन संभव है.

निवारक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह व्यवस्था अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. असंचारी बीमारियों के उपचार पर होने वाला व्यय परिवारों और सरकार दोनों के लिए भारी पड़ता है. यदि आहार संबंधी जोखिम कारकों को प्रारंभिक स्तर पर ही नियंत्रित किया जाए, तो दीर्घकाल में रोग-भार कम किया जा सकता है. सरल लेबलिंग उपभोक्ता को दैनिक जीवन के छोटे निर्णयों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का अवसर देती है. यह उपचार के बजाय रोकथाम पर बल देने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को सुदृढ़ करती है.

विश्व स्तर पर भी स्पष्ट और व्याख्यात्मक लेबलिंग प्रणालियों को प्रभावी माना गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह रेखांकित किया है कि विशेषकर विकासशील देशों में सरल और चेतावनी-आधारित संकेत उपभोक्ता समझ को बढ़ाते हैं तथा आहार संबंधी व्यवहार में परिवर्तन लाने में सहायक होते हैं. यह केवल उपभोक्ता को ही नहीं, बल्कि उत्पाद निर्माताओं को भी अपने उत्पादों की संरचना में सुधार के लिए प्रेरित करता है.

उद्योग जगत का एक वर्ग यह तर्क देता है कि कठोर लेबलिंग से बिक्री घट सकती है और छोटे उत्पादक प्रभावित हो सकते हैं. किंतु अनुभव यह दर्शाता है कि जब स्पष्ट मानक निर्धारित होते हैं, तो उद्योग नवाचार और पुनर्संरचना के माध्यम से स्वयं को अनुकूलित कर लेता है. यदि उपभोक्ता उच्च शर्करा या नमक वाले उत्पादों से बचने लगते हैं, तो उत्पादक स्वाभाविक रूप से उनके स्तर को कम करने का प्रयास करते हैं. इस प्रकार लेबलिंग स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है.

भारतीय संदर्भ में खाद्य नियमन का दायित्व भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के पास है. साथ ही, भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने भी जनस्वास्थ्य से जुड़े विषयों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व पर बल दिया है. यह स्पष्ट संकेत है कि खाद्य लेबलिंग केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित का विषय है.

फिर भी इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं. पहली चुनौती उद्योग का प्रतिरोध है, जो इसे आर्थिक दृष्टि से हानिकारक मानता है. दूसरी चुनौती लेबलिंग के स्वरूप को लेकर मतभेद है—क्या चेतावनी आधारित मॉडल अपनाया जाए या किसी प्रकार की श्रेणीकरण प्रणाली. तीसरी चुनौती प्रवर्तन और निगरानी की है, क्योंकि देश में लाखों खाद्य उत्पाद उपलब्ध हैं. चौथी चुनौती उपभोक्ता साक्षरता की है, विशेषकर ग्रामीण और निम्न आय वर्गों में, जहाँ पोषण संबंधी जागरूकता सीमित है.

इन चुनौतियों का समाधान संतुलित और चरणबद्ध नीति के माध्यम से संभव है. व्यापक जन-जागरूकता अभियान, सरल प्रतीकों का प्रयोग और कठोर प्रवर्तन तंत्र इस दिशा में सहायक हो सकते हैं. विद्यालयों और सामुदायिक स्तर पर पोषण शिक्षा को सुदृढ़ करना भी आवश्यक है, ताकि लेबलिंग का संदेश प्रभावी ढंग से समझा जा सके.

अंततः, पैकेज के अग्रभाग पर लेबलिंग बदलते पोषण परिदृश्य में सूचित विकल्प के अधिकार को सशक्त बनाने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है. यह उपभोक्ता को निष्क्रिय खरीदार से सक्रिय और जागरूक नागरिक में रूपांतरित करती है. पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निवारक स्वास्थ्य के सिद्धांतों पर आधारित यह व्यवस्था भारत को उपचार-केंद्रित दृष्टिकोण से हटाकर स्वास्थ्य-उन्मुख खाद्य प्रणाली की ओर अग्रसर कर सकती है. यदि इसे दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक आधार और सामाजिक सहभागिता के साथ लागू किया जाए, तो यह एक स्वस्थ, सक्षम और जागरूक भारत की दिशा में निर्णायक कदम सिद्ध हो सकती है.
 

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