लखनऊ कोचिंग अग्निकांड: क्या हमारे बच्चों की सुरक्षा सिर्फ खबर बनकर रह जाएगी?

लखनऊ में हुए हालिया कोचिंग अग्निकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. धुएँ से घिरी इमारतें, चीखते-बिलखते विद्यार्थी, घबराए हुए अभिभावक और राहत-बचाव दलों की भागदौड़—ये दृश्य केवल एक दुर्घटना की तस्वीर नहीं हैं, बल्कि हमारी व्यवस्था की उन कमजोरियों का आईना हैं जिन्हें हम वर्षों से अनदेखा करते आ रहे हैं. हर बार किसी बड़े हादसे के बाद कुछ दिनों तक शोक, संवेदना और आक्रोश दिखाई देता है, फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चों की सुरक्षा केवल कुछ दिनों की खबर बनकर रह जाएगी? क्या हम तब तक जागेंगे नहीं, जब तक अगली त्रासदी किसी और शहर में, किसी और कोचिंग संस्थान या हॉस्टल में घटित नहीं हो जाती?

आज भारत में लाखों विद्यार्थी अपने घरों से दूर रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. कोटा, दिल्ली, लखनऊ, प्रयागराज, पटना, जयपुर और चंडीगढ़ जैसे शहर शिक्षा के बड़े केंद्र बन चुके हैं. अभिभावक अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए बड़ी उम्मीदों के साथ उन्हें इन संस्थानों में भेजते हैं. वे फीस भरते हैं, हॉस्टल का खर्च उठाते हैं और यह भरोसा करते हैं कि जहां उनका बच्चा पढ़ रहा है, वहां उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा. दुर्भाग्य से यह भरोसा कई बार टूट जाता है.

ऐसे हादसे अचानक नहीं होते. इनके पीछे वर्षों की लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही की कमी होती है. जब किसी इमारत में पर्याप्त आपातकालीन निकास नहीं होते, जब बिजली की वायरिंग मानकों के अनुरूप नहीं होती, जब फायर एक्सटिंग्विशर केवल दिखावे के लिए लगाए जाते हैं, जब भवन निर्माण नियमों को ताक पर रखकर व्यावसायिक गतिविधियां चलाई जाती हैं, तब किसी भी दिन एक छोटी-सी चिंगारी बड़ी त्रासदी का रूप ले सकती है.

इस घटना के बाद सबसे पहला प्रश्न अभिभावकों को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या उन्होंने कभी अपने बच्चे के कोचिंग संस्थान, हॉस्टल या पीजी की सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक जांच की है? अक्सर हम संस्थान की प्रतिष्ठा, परिणाम और सुविधाओं के बारे में पूछते हैं, लेकिन सुरक्षा संबंधी प्रश्नों को नजरअंदाज कर देते हैं. यह प्रवृत्ति बदलनी होगी. बच्चे के भविष्य जितना महत्वपूर्ण है, उसका जीवन और सुरक्षा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

अभिभावकों को सबसे पहले आपातकालीन निकास की स्थिति की जांच करनी चाहिए. किसी भी भवन में आग लगने की स्थिति में सुरक्षित निकास जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है. कई संस्थानों में आपातकालीन सीढ़ियां या तो बंद रहती हैं या उनमें सामान भरा रहता है. कुछ जगहों पर सुरक्षा द्वारों पर ताले लगे होते हैं. ऐसी स्थिति में भगदड़ और अफरा-तफरी के दौरान बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाता है. यदि किसी भवन में आपातकालीन निकास स्पष्ट रूप से चिन्हित नहीं हैं या उनके उपयोग में कोई बाधा है, तो उसे गंभीर चेतावनी समझना चाहिए.

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता और कार्यशीलता है. फायर एक्सटिंग्विशर केवल दीवारों पर टांग देने से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती. उनकी नियमित जांच, रखरखाव और समय-समय पर रिफिलिंग आवश्यक है. अभिभावकों को यह जानने का अधिकार है कि संस्थान में कितने अग्निशमन यंत्र हैं, उनकी वैधता क्या है और क्या स्टाफ को उनके उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया है. यदि कोई संस्थान इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं देता, तो उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर संदेह होना चाहिए.

तीसरा मुद्दा फायर एनओसी यानी अग्नि सुरक्षा अनापत्ति प्रमाणपत्र का है. हमारे देश में अक्सर देखा गया है कि कागजों पर सभी नियम पूरे दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति अलग होती है. कई बार निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है. इसलिए केवल एनओसी की प्रति देखना पर्याप्त नहीं है. उसकी वैधता, निरीक्षण रिपोर्ट और सुरक्षा मानकों की वास्तविक स्थिति की भी जांच आवश्यक है. प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि फायर एनओसी केवल कागजी प्रक्रिया न रह जाए, बल्कि वास्तविक सुरक्षा का प्रमाण बने.

इमारत की संरचना भी सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है. कई कोचिंग संस्थान संकरी गलियों में स्थित बहुमंजिला इमारतों में संचालित होते हैं. इनमें पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं होता, खिड़कियां सीमित होती हैं और भीड़ क्षमता से कहीं अधिक होती है. ऐसी इमारतें दुर्घटना की स्थिति में मौत के जाल में बदल सकती हैं. इसलिए भवन निर्माण मानकों का पालन सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है.

सुरक्षा केवल उपकरणों से नहीं आती, बल्कि तैयारी से भी आती है. क्या संस्थान नियमित फायर ड्रिल आयोजित करता है? क्या विद्यार्थियों को बताया जाता है कि आपातकाल की स्थिति में क्या करना है? क्या स्टाफ को प्राथमिक आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है? इन प्रश्नों के उत्तर अक्सर नकारात्मक होते हैं. जबकि विकसित देशों में स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में नियमित सुरक्षा अभ्यास अनिवार्य होता है. भारत में भी यह व्यवस्था लागू की जानी चाहिए.

यह समस्या केवल कोचिंग संस्थानों तक सीमित नहीं है. हॉस्टल, पीजी, छात्रावास और निजी आवासीय व्यवस्थाएं भी अक्सर सुरक्षा मानकों की अनदेखी करती हैं. अनेक स्थानों पर क्षमता से अधिक विद्यार्थियों को रखा जाता है. संकरी सीढ़ियां, बंद खिड़कियां और खराब विद्युत व्यवस्था जोखिम को कई गुना बढ़ा देती हैं. इसलिए सुरक्षा का दायरा व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए.

प्रशासन की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है. दुर्घटना के बाद जांच समिति गठित करना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है. आवश्यकता इस बात की है कि नियमित निरीक्षण और कठोर निगरानी की व्यवस्था विकसित की जाए. प्रत्येक शहर में कोचिंग संस्थानों और छात्रावासों का वार्षिक सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए. जिन संस्थानों में गंभीर खामियां पाई जाएं, उन्हें सुधार तक संचालन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

इसके साथ ही स्थानीय निकायों और अग्निशमन विभाग को तकनीकी संसाधनों और मानवबल से मजबूत बनाना होगा. कई बार दुर्घटना के दौरान फायर ब्रिगेड समय पर नहीं पहुंच पाती. संकरी गलियां, ट्रैफिक और अपर्याप्त संसाधन राहत कार्यों को प्रभावित करते हैं. यदि हम वास्तव में ऐसी घटनाओं को रोकना चाहते हैं, तो आपातकालीन सेवाओं को अधिक सक्षम बनाना होगा.

समाज और मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. मीडिया को केवल सनसनीखेज तस्वीरें दिखाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उसे उन कारणों की गहराई से पड़ताल करनी चाहिए जो ऐसी घटनाओं को जन्म देते हैं. वहीं समाज को भी सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त करने से आगे बढ़कर सक्रिय भागीदारी करनी होगी. अभिभावक संगठनों, नागरिक समूहों और सामाजिक संस्थाओं को सुरक्षा मानकों की निगरानी और जागरूकता अभियान में भाग लेना चाहिए.

आज आवश्यकता एक सामूहिक आंदोलन की है. जिस प्रकार स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर जन-जागरूकता अभियान चलाए गए, उसी प्रकार शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा को लेकर भी व्यापक अभियान की जरूरत है. प्रत्येक अभिभावक, प्रत्येक छात्र और प्रत्येक नागरिक को यह समझना होगा कि सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है.

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अक्सर हादसों से सीखते नहीं हैं. दिल्ली, सूरत, राजकोट, कोटा और देश के कई अन्य हिस्सों में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं. हर बार जांच हुई, रिपोर्टें बनीं, सिफारिशें आईं और फिर धीरे-धीरे सब कुछ भुला दिया गया. यदि इस बार भी हम केवल शोक व्यक्त करके आगे बढ़ गए, तो यह उन मासूम बच्चों के प्रति अन्याय होगा जिनके सपने और जीवन इन दुर्घटनाओं की भेंट चढ़ जाते हैं.

अंततः यह समझना होगा कि बच्चों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है और केवल अभिभावकों का दायित्व भी नहीं. यह एक साझा उत्तरदायित्व है जिसमें संस्थान, सरकार, समाज, मीडिया और परिवार सभी की भूमिका है. जब तक जवाबदेही की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक नियम केवल कागजों में रहेंगे और हादसे दोहराए जाते रहेंगे.

आज आवश्यकता है कि हर अभिभावक अपने बच्चे के संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था की व्यक्तिगत रूप से जांच करे. संचालकों से सवाल पूछे, प्रमाण मांगे और संतोषजनक उत्तर न मिलने पर आवाज उठाए. बच्चों के जीवन से बड़ा कोई समझौता नहीं हो सकता.

लखनऊ का यह अग्निकांड केवल एक शहर की त्रासदी नहीं है. यह पूरे देश के लिए चेतावनी है. यदि हम अब भी नहीं जागे, तो अगली खबर किसी और शहर से आएगी, किसी और परिवार की दुनिया उजड़ जाएगी और हम फिर वही सवाल पूछेंगे—क्या हमारे बच्चों की सुरक्षा सिर्फ खबर बनकर रह जाएगी?

समय आ गया है कि इस सवाल का जवाब शब्दों से नहीं, ठोस कार्रवाई से दिया जाए.

डॉ. सत्यवान सौरभ के अन्य अभिमत

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