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वंदे मातरम: एक खूबसूरत गीत के बदसूरत विवाद! 

अंग्रेज़ी शासन के खि़लाफ़ अपने प्रदर्शन में इस गाने का भरपूर इस्तेमाल किया, इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही शामिल थे.

वंदे मातरम एक खूबसूरत देशभक्ति गीत है, जिस पर समय-समय पर बदसूरत सवालिया निशान लगाए गए, लेकिन यह गीत और भी सुंदर, और भी ताकतवर होकर उभरा है. विभिन्न प्रेस रिपोर्ट इसे लेकर विविध विचार, विवाद और विवरण प्रदान करती हैं.
दैनिक भास्कर कहता है कि- 26 जनवरी को भारत 77 वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है. इस बार मुख्य परेड की थीम वंदे मातरम पर रखी गई है.
आज तक कहता है कि- इस साल गणतंत्र दिवस परेड के अवसर पर कर्तव्य पथ की फिजाओं में कीरवानी का संगीत गूंजेंगा. यह मौका इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन देशभक्ति गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी. इस ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाने के लिए कीरवानी ने विशेष धुन तैयार की है. कीरवानी ने एक्स पर लिखा- फेमस गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर, मुझे संस्कृति मंत्रालय के तहत 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड के लिए संगीत कंपोज़ करने का बहुत सम्मान और सौभाग्य महसूस हो रहा है. यह शानदार प्रस्तुति पूरे भारत से 2,500 कलाकारों द्वारा दी जाएगी. हमारे देश की भावना का जश्न मनाने के लिए हमारे साथ बने रहें.
बीबीसी की वंदे मातरम को लेकर रिपोर्ट है कि- वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस पर चर्चा में कहा कि- जब वंदे मातरम के पचास वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था. जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था.
उन्होंने कहा कि- इसके 150 वर्ष उस महान अध्याय को उस गौरव को पुनःस्थापित करने का अवसर है . 

पीएम मोदी ने कहा कि- यह गीत ऐसे समय पर लिखा गया जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ सल्तनत बौखलाई हुई थी. भारत पर भांति-भांति का दबाव था, भांति-भांति के जुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को अंग्रेज़ों के द्वारा मजबूर किया जा रहा था.
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि- पार्टी ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान इस गीत के कुछ अहम हिस्से को हटा दिया था, तो वहीं कांग्रेस ने इन आरोपों को निराधार बताया.
यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा, जो बांग्ला और संस्कृत में था.
यह गीत बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपनी प्रसिद्ध लेकिन विवादस्पद कृति आनंदमठ (1885) में जोड़ दिया.
बाद में रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इसके लिए एक धुन भी बनाई. 7 नवंबर को वंदे मातरम की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया था कि, कांग्रेस ने 1937 के फ़ैज़ाबाद अधिवेशन से पहले वंदे मातरम के कुछ अहम हिस्सों को हटा दिया था.
उन्होंने तब कहा था- 1937 में वंदे मातरम के कुछ अहम पदों को, उसकी आत्मा के एक हिस्से को हटा दिया गया था. वंदे मातरम को तोड़ दिया गया था. ये अन्याय क्यों किया गया. इसी ने विभाजन के बीज बोए.
इन आरोपों के जवाब में कांग्रेस प्रवक्ता जयराम नरेश ने वंदे मातरम पर सब्यसाची भट्टाचार्य की लिखी एक किताब का ज़िक्र करते हुए एक्स पर पोस्ट किया था, कांग्रेस वर्किंग कमेटी की 1937 में हुई बैठक से तीन दिन पहले ख़ुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने नेहरू जी को इस बारे में ख़त लिखा.
वंदे मातरम से वो ख़ुद जुड़े हुए थे और उन्होंने ही सुझाव दिया कि इस गीत के पहले दो स्टेंजा (हिस्सों) को अपनाना चाहिए, और बैठक में लिया गया फ़ैसला उन्हीं के ख़त से प्रभावित था. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर पर विभाजनकारी विचारधारा रखने का आरोप लगा रहे हैं.
इसके अलावा 10 नवंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उनकी सरकार राज्य के स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षा संस्थाओं में वंदे मातरम को गाना अनिवार्य कर देगी.
वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के कार्यक्रम के दौरान 11 नवंबर को बाराबंकी ज़िले में उन्होंने कहा, जो भी वंदे मातरम का विरोध कर रहा है, वह भारत माता का विरोध कर रहा है.
उन्होंने कहा कि, आज भी कुछ लोग हैं, रहेंगे हिंदुस्तान में, खाएंगे हिंदुस्तान में, लेकिन वंदे मातरम नहीं गाएंगे.
बंकिम चंद्र चटर्जी (1838-1894) पहले हिंदुस्तानी थे जिन्हें इंग्लैंड की रानी ने भारतीय उपनिवेश को अपने अधीन में लेने के बाद 1858 में डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त किया था.
वे 1891 में रिटायर हुए और अंग्रेज़ शासकों ने उन्हें राय बहादुर समेत कई उपाधियों से सम्मानित किया.
यह गीत उन्होंने 1875 में लिखा जो बांग्ला और संस्कृत में था. यह गीत बाद में बंकिम ने अपनी प्रसिद्ध लेकिन विवादस्पद कृति आनंदमठ (1885) में जोड़ दिया.
इस गीत से जुड़ा एक रोचक सच यह है कि इसमें जिन प्रतीकों और जिन दृश्यों का ज़िक्र है वे सब बंगाल की धरती से ही संबंधित हैं.
इस गीत में बंकिम ने सात करोड़ जनता का भी उल्लेख किया है जो उस समय बंगाल प्रांत (जिस में ओडिशा-बिहार शामिल थे) की कुल आबादी थी. इसी तरह जब अरबिंदो घोष ने इसका अनुवाद किया तो इसे बंगाल का राष्ट्रगीत का टाइटल दिया.
रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस गीत के लिए एक ख़ूबसूरत धुन भी बनाई थी.
बंगाल के बंटवारे ने इस गीत को सचमुच में बंगाल का राष्ट्रगीत बना दिया. 1905 में अंग्रेज़ सरकार की ओर से बंगाल के विभाजन के विरुद्ध उठे जनआक्रोश ने इस गीत विशेषकर इसके मुखड़े को अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ एक हथियार में बदल दिया.
तब स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में हिस्सा ले रहे लोगों ने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ अपने प्रदर्शन में इस गाने का भरपूर इस्तेमाल किया. इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही शामिल थे.
स्निगधेंदु भट्टाचार्य कहते हैं, रबींद्रनाथ का मानना था कि मुस्लिम समुदाय समेत किसी को भी गीत के शुरुआती दो छंदों पर आपत्ति जताने की कोई वजह नहीं है, लेकिन बाद के छंदों पर आपत्ति करने के लिए काफ़ी कारण थे. उन्होंने यह भी कहा कि पहले दो छंदों को नॉवेल से पूरी तरह अलग रखने में उन्हें कोई दिक्क़त नहीं हुई. रबींद्रनाथ की सलाह पर, कांग्रेस ने तय किया कि पहले दो छंद सभी कार्यक्रमों में गाए जाएँगे.
एबीपी न्यूज़ बताती है कि- केंद्र ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया है कि राष्ट्रगान जन गण मन और राष्ट्रगान वंदे मातरम समान महत्व रखते हैं और नागरिकों को दोनों का समान सम्मान करना चाहिए. केंद्र ने कहा कि राष्ट्रगान के विपरीत, वंदे मातरम गाने या बजाने के संबंध में कोई दंडात्मक प्रावधान या आधिकारिक निर्देश नहीं हैं, जबकि यह गीत भारतीयों की भावनाओं और मानस में एक विशेष स्थान रखता है और इस गीत से संबंधित उच्च न्यायालयों और सर्वाेच्च न्यायालय के सभी निर्देशों का पालन किया जा रहा है.
गृह मंत्रालय ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका के जवाब में हलफनामे के आधार पर यह बात कही है, जिसमें यह सुनिश्चित करने की मांग की गई है कि वंदे मातरम गीत को राष्ट्रगान के समान सम्मान और दर्जा दिया जाए.
केंद्र सरकार ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों की अपनी-अपनी पवित्रता है और वे समान सम्मान के पात्र हैं, और वर्तमान कार्यवाही का विषय कभी भी रिट याचिका का विषय नहीं हो सकता.
केंद्र सरकार के वकील मनीष मोहन के माध्यम से दायर किए गए संक्षिप्त प्रतिवाद में कहा गया है, जन गण मन और वंदे मातरम दोनों समान महत्व रखते हैं और देश के प्रत्येक नागरिक को दोनों के प्रति समान सम्मान दिखाना चाहिए. राष्ट्रीय गीत भारत की जनता की भावनाओं और मानस में एक अद्वितीय और विशेष स्थान रखता है.
अदालत को बताया गया कि वंदे मातरम को बढ़ावा देने का मुद्दा पहले ही सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा निपटाया जा चुका है, जिसने किसी भी बहस में पड़ने से इनकार कर दिया था क्योंकि संविधान में किसी राष्ट्रीय गीत का कोई उल्लेख नहीं है.
इसके बाद, उच्च न्यायालय ने अपने जवाब में कहा कि उसने वंदे मातरम गाने और बजाने के लिए दिशानिर्देशों की मांग वाली एक अन्य याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि यह गीत उस सम्मान और आदर का पात्र है, जिसे अधिकारियों द्वारा मान्यता दी गई है.
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा, “राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों का अपना-अपना महत्व है और दोनों समान सम्मान के पात्र हैं. हालांकि, मौजूदा कार्यवाही का विषय माननीय उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने का विषय नहीं हो सकता, विशेषकर स्थापित स्थिति को देखते हुए.” केंद्र ने कहा कि यह मामला “विरोधात्मक नहीं है” और वह न्यायालय द्वारा दिए गए “हर उस निर्देश का पालन करेगा जिसे आवश्यक और उचित समझा जाए”.
1971 में, राष्ट्रगान गाने से रोकने या ऐसे गायन में संलग्न किसी भी सभा में अशांति पैदा करने की कार्रवाई को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 के अधिनियमन के माध्यम से दंडनीय अपराध बना दिया गया था.
“हालांकि, राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के मामले में सरकार द्वारा ऐसे कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं किए गए हैं और न ही ऐसे कोई निर्देश जारी किए गए हैं जिनमें यह बताया गया हो कि इसे किन परिस्थितियों में गाया या बजाया जा सकता है,” जवाब में कहा गया. इसमें आगे कहा गया कि केंद्र सरकार समय-समय पर उच्च न्यायालयों और भारत के सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों का पालन कर रही है. जवाब में यह भी कहा गया कि याचिका में कुछ कथन “व्यक्तिगत सुझावों” की प्रकृति के हैं, जिन पर संवैधानिक या कानूनी जनादेश के अधीन, व्यवस्था में शामिल किए जाने से पहले प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है.
याचिकाकर्ता ने केंद्र और दिल्ली सरकार से यह निर्देश देने की भी मांग की कि सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में हर कार्यदिवस पर जन गण मन और वंदे मातरम बजाया और गाया जाए. याचिकाकर्ता का तर्क है कि गीत का सम्मान करने के लिए किसी भी दिशा-निर्देश या नियम के अभाव में, वंदे मातरम को असभ्य तरीके से गाया जा रहा है और फिल्मों और पार्टियों में इसका दुरुपयोग किया जा रहा है.
याचिकाकर्ता ने कहा कि इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा 1950 में दिए गए बयान के मद्देनजर इसे जन गण मन के समान ही सम्मानित किया जाना चाहिए.
देश को एकजुट रखने के लिए, सरकार का यह कर्तव्य है कि वह जन गण मन और वंदे मातरम को बढ़ावा देने और प्रचारित करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाए. चूंकि ये दोनों ही संविधान निर्माताओं द्वारा तय किए गए हैं, इसलिए इससे किसी अन्य भावना को भड़काने का कोई कारण नहीं है.
याचिका में कहा गया है, जन गण मन में व्यक्त भावनाएं राज्य को ध्यान में रखते हुए व्यक्त की गई हैं. हालांकि, वंदे मातरम में व्यक्त भावनाएं राष्ट्र के चरित्र और शैली को दर्शाती हैं और समान सम्मान की पात्र हैं.
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि वंदे मातरम का कोई नाटकीय रूपांतरण नहीं होना चाहिए और इसे किसी भी तरह के मनोरंजन कार्यक्रम में शामिल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जब भी इसे गाया या बजाया जाता है, तो उपस्थित सभी लोगों के लिए उचित सम्मान और आदर दिखाना अनिवार्य है.
याचिका में आग्रह किया गया है कि यह निर्देश दिया जाए और घोषित किया जाए कि वंदे मातरम गीत, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, को जन गण मन के समान सम्मान दिया जाए और संविधान सभा के अध्यक्ष माननीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा 24.01.1950 को राष्ट्रगान के संबंध में दिए गए बयान की भावना के अनुरूप इसे समान दर्जा दिया जाए. 
एनडीटीवी इंडिया बताता है- वंदे मातरम जो हमारा राष्ट्रीय गीत है, वो जन गण मन से 35 साल पहले लिखा गया था, लेकिन आज भी यह सवाल उठता रहता है कि वंदे मातरम राष्ट्र गान क्यों नहीं बना. बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1876 को इसकी रचना की थी और जन गण मन रवींद्र नाथ टैगोर ने 1911 में लिखा था. संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के तौर पर चुना था.
वंदे मातरम् जो आजादी की लड़ाई के दौरान आंदोलनकारियों का अमर गीत बना. बंगाल का 1905 में विभाजन करने वाली ब्रिटिश सरकार इस कदर दहशत कांप गई कि स्कूल-कॉलेजों से लेकर किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में वंदे मातरम गाने पर रोक लगा दी गई, लोगों को जेलों में डाला गया और जुर्माना भी लगाया गया.
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान 1905 से 1947 के बीच वंदे मातरम को राष्ट्रगान का दर्जा देने की मांग उठती रही. लाल बाल पाल यानी लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल और लोकमान्य तिलक भी इसके मुखर समर्थक थे. इसमें स्वराज की आवाज उठाने वाले बाल गंगाधर तिलक भी थे. अरविंद घोष ने कहा था कि ये भारतीय आत्मा को जगाने वाला गीत है. जन गण मन लिखने वाले रवींद्रनाथ टैगोर ने भी इसका सम्मान करते थे और पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने ही ये गाया था. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत बताते हुए हर जगह गाने की वकालत की. सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज में वंदे मातरम को अपनाया!

प्रदीप द्विवेदी के अन्य अभिमत

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