भारत ने अमेरिका के लिए शून्य शुल्क पर सहमति जताई या विवादित दावों में उलझा समझौता

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भारत ने अमेरिका के लिए शून्य शुल्क पर सहमति जताई या विवादित दावों में उलझा समझौता


भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित व्यापार समझौते ने राजनीतिक और आर्थिक चर्चा में नया उबाल ला दिया है. सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फोन बातचीत के बाद यह समझौता हुआ, जिसमें अमेरिकी पक्ष ने दावा किया कि भारत ने औद्योगिक वस्तुओं पर लागू 13.5% टैरिफ को शून्य पर लाने पर सहमति जताई है. हालांकि, भारत ने अभी तक इस पर स्पष्ट बयान नहीं दिया है और कृषि एवं संवेदनशील क्षेत्रों में टैरिफ पर कुछ संरक्षण बनाए रखने की बात कही है.



अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने CNBC को बताया कि इस समझौते में कुछ फलों, शराब, नट्स और अन्य कृषि उत्पादों पर टैरिफ शून्य कर दिए जाएंगे, जबकि कुछ महत्वपूर्ण वस्तुएं जैसे चावल, डेयरी और चीनी समझौते से बाहर हैं. भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने प्रेस को संबोधित करते हुए मोदी-ट्रंप “मित्रता” की तारीफ की और कहा कि यह समझौता “140 करोड़ भारतीयों के लिए लाभकारी” होगा. उन्होंने कहा कि समझौते पर अंतिम रूप जल्द ही दिया जाएगा.



ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि भारत ने अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर के सामान खरीदने, अमेरिकी टैरिफ शून्य करने और रूस से तेल आयात बंद करने पर सहमति जताई है, लेकिन मोदी ने इस पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की. इस बीच भारतीय विपक्ष ने इसे “देश बेचने के दबाव” के रूप में करारा आलोचना किया है.



विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दोनों पक्ष टैरिफ कटौती को सोशल मीडिया पर बताए गए अनुसार लागू करते हैं, तो यह भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक अवसरों के द्वार खोल सकता है. इसके अलावा यह भारत की “चाइना-प्लस-वन” रणनीति के लिए भी अहम है, जिससे विदेशी निवेशकों को चीन के विकल्प के रूप में भारत में उत्पादन केंद्र बनाने में मदद मिल सकती है.



हालांकि, समझौते के कई पहलू अभी अस्पष्ट हैं — कौन-कौन से उत्पाद शामिल हैं, कितने समय में टैरिफ शून्य होंगे और रूस या अन्य देशों से तेल आयात पर भारत की स्थिति क्या होगी, इन सभी सवालों का अभी जवाब नहीं आया है. अमेरिकी और भारतीय अधिकारी केवल यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि संवेदनशील क्षेत्र जैसे कृषि और डेयरी पर कोई जोखिम न हो.



इस समझौते के पीछे राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही महत्वाकांक्षाएं हैं. अमेरिकी विशेषज्ञों ने इसे भारत के लिए “क्षेत्र में सबसे बेहतर सौदा” करार दिया है, जबकि घरेलू विपक्षी नेताओं ने इसके आर्थिक और रणनीतिक प्रभावों पर सवाल उठाए हैं.



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