लिखने से पहले खुद से सवाल कीजिए क्योंकि सच्चाई वहीं से जन्म लेती

जब आप लिखने बैठते हैं, तो सबसे पहले कीबोर्ड या कागज से नहीं, खुद से संवाद शुरू होना चाहिए। यह संवाद साधारण नहीं होता, बल्कि ईमानदारी की कसौटी पर खड़ा होता है। उस सवाल का जवाब अगर आपको भीतर से सही लगे, तो लिखना शुरू कीजिए। और अगर वह जवाब अधूरा, उधार या बनावटी लगे, तो रुकिए—और उसे खोजिए। क्योंकि लेखन वहीं अर्थपूर्ण बनता है, जहां सवाल और जवाब के बीच सच्चाई जन्म लेती है।

लिखना केवल शब्द जोड़ने की प्रक्रिया नहीं है। यह एक जिम्मेदारी है, जो लेखक से पहले इंसान की ईमानदारी मांगती है। पत्रकारिता तो और भी अधिक। यह कोई मशीन नहीं है, जो हर दिन घटने वाली घटनाओं को एक ही ढर्रे पर उगल दे। यह एक सतत आत्मसंवाद है, जिसमें सबसे पहला सवाल बाहर की दुनिया से नहीं, भीतर की चेतना से आता है। अगर लिखना शुरू करने से पहले यह सवाल नहीं उठता कि “क्या यह बात कोई और भी कह रहा है?”, तो कलम अनजाने में भीड़ का हिस्सा बन जाती है। और भीड़ का हिस्सा बनकर लिखी गई कोई भी बात, चाहे कितनी ही सही क्यों न हो, अपनी धार खो देती है।

जिस क्षण आपको यह एहसास हो जाए कि जो आप लिखने जा रहे हैं, वह पहले से सैकड़ों जगह, सैकड़ों बार लिखा जा चुका है, उसी क्षण रुक जाना भी एक पेशेवर निर्णय है। यह रुकना कमजोरी नहीं है, बल्कि परिपक्वता का संकेत है। क्योंकि हर बार लिखना जरूरी नहीं, कभी-कभी न लिखना ही सबसे ईमानदार पत्रकारिता होती है।

आज का पाठक सूचना का भूखा नहीं है। उसके पास सूचना की भरमार है। मोबाइल स्क्रीन पर उंगली सरकाते ही उसे “क्या हुआ” की अनगिनत खबरें मिल जाती हैं। किसने क्या कहा, कहां क्या हुआ, किसने किस पर आरोप लगाया—यह सब वह पहले ही देख चुका होता है। ऐसे में अगर पत्रकार भी वही दोहराता है, तो वह पाठक के समय का अपमान करता है। आज का पाठक यह जानना चाहता है कि ऐसा क्यों हुआ, इसके पीछे कौन-से कारण थे, और सबसे अहम—इसका आगे क्या असर होगा। उसकी जिज्ञासा केवल तथ्य से नहीं, समझ से शांत होती है।

यहीं साधारण खबर और सार्थक लेखन के बीच फर्क पैदा होता है। खबर तथ्य बताती है, लेकिन विश्लेषण संदर्भ रचता है। खबर आज की घटना दर्ज करती है, लेकिन सोच यह समझने की कोशिश करती है कि आज जो हुआ, वह कल को कैसे प्रभावित करेगा। जब आप केवल घटना लिखते हैं, तो आप सूचना दे रहे होते हैं; लेकिन जब आप उसके निहितार्थ खोलते हैं, तो आप समाज से संवाद कर रहे होते हैं। यही संवाद लेखन को जीवंत बनाता है।

इंटरनेट के युग में “यूनिक कंटेंट” एक तकनीकी शब्द बन गया है, लेकिन उसकी आत्मा तकनीक से कहीं गहरी है। मौलिकता शब्द बदलने से नहीं आती, दृष्टि बदलने से आती है। एक ही घटना को सौ लोग देख सकते हैं, लेकिन हर कोई उसे समझ नहीं सकता। लेखक का काम वही है—उस कोण को खोज निकालना, जिसे या तो अनदेखा किया जा रहा है या जिसे समझना कठिन है। जब वह छिपा हुआ पहलू सामने आता है, तब लेख केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि पाठक के भीतर ठहरता है।

आज पाठक लगातार सवाल पूछ रहा है। सत्ता से, व्यवस्था से, समाज से—और अब मीडिया से भी। अगर लेखन इन सवालों से भागेगा, तो वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि लिखने वाला खुद सवालों से न डरे। हर पंक्ति के पीछे एक सवाल हो और हर पैराग्राफ उस सवाल के जवाब की ईमानदार तलाश करता दिखे।

जो लिखने वाला यह सोचता है कि “यह बात कोई और नहीं कह रहा”, वह अनजाने में जोखिम उठा रहा होता है। और बिना जोखिम उठाए कोई भी विचार आगे नहीं बढ़ता। यह जोखिम कभी लोकप्रिय राय के खिलाफ जाने का होता है, कभी सत्ता को असहज करने का, और कभी अपने ही पाठकों की सहज उम्मीदों को तोड़ने का। लेकिन यही जोखिम पहचान बनाता है। सुरक्षित लेखन भीड़ में गुम हो जाता है, जबकि साहसिक सोच अलग पहचान रचती है।

आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गूगल, रैंकिंग और ट्रेंड की बहुत चर्चा होती है। लेकिन गूगल को लक्ष्य बना लेना खतरनाक है। गूगल इंसान नहीं है, पर वह इंसानों के व्यवहार को समझता है। जो लेख पढ़ा जाता है, साझा किया जाता है, जिस पर पाठक समय बिताता है—वही महत्व पाता है। इसका सीधा अर्थ है कि अगर आप पाठक को मूल्य दे रहे हैं, तो तकनीक अपने आप आपके पक्ष में खड़ी हो जाती है। इसलिए गूगल के लिए नहीं, पाठक के लिए लिखना ही सबसे सही रणनीति है।

“कंटेंट इज़ किंग” एक घिसा हुआ वाक्य लग सकता है, लेकिन उसका अर्थ आज भी उतना ही सटीक है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब हर कंटेंट राजा नहीं बन सकता। वही लेख प्रभावशाली होता है, जिसमें अनुभव की गहराई हो, सोच की ईमानदारी हो और भाषा में आत्मा हो। सूचना ढोने वाली कलम और अर्थ गढ़ने वाली कलम में यही फर्क होता है।

आत्मीय शैली का मतलब भावुकता नहीं है। इसका मतलब है पाठक से बराबरी के स्तर पर संवाद। उसे उपदेश नहीं, सहभागिता का न्योता। जब पाठक को लगता है कि “यह सवाल मेरे मन में भी था”, तब लेख और पाठक के बीच रिश्ता बनता है। और यही रिश्ता किसी भी लेखन की सबसे बड़ी ताकत है।

आज की सबसे बड़ी चुनौती गति और गहराई के बीच संतुलन बनाना है। हर खबर का लंबा विश्लेषण संभव नहीं, लेकिन हर खबर में सोच का बीज बोया जा सकता है। कभी-कभी एक सटीक सवाल, दर्जनों साधारण खबरों से ज्यादा असर छोड़ देता है।

जब आप “क्या हुआ” से आगे बढ़कर “क्यों हुआ” और “अब क्या होगा” तक पहुंचते हैं, तब आप भविष्य के लिए लिखते हैं। समाज को केवल आईना नहीं चाहिए, उसे रास्ता भी चाहिए। और रास्ता आदेश से नहीं, विवेक से बनता है।

अंततः लिखना कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक दृष्टि है। अगर दृष्टि मौलिक है, तो शब्द अपने आप अलग होंगे। अगर सोच गहरी है, तो भाषा अपने आप वजनदार होगी। और अगर नीयत साफ है, तो लिखा गया हर शब्द अपने आप खास बन जाएगा।

क्योंकि सच यही है—
लिखना वहीं से अर्थ पाता है,
जहां लेखक सबसे पहले खुद से सवाल करता है।

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